एक ऐसा सपना…..

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आज रात एक सपना देखा था। वैसे रात नहीं सुबह ही हो गई थी। समय कुछ 5:25am हो रहा था। सपना बहुत भयानक था या यूं कहूं डरावना था। रूह कांप सी गई थी। लेकिन सपना था, हकीकत में आ कर कुछ देर बाद मन शांत हो पाया।

आज कल दिल दिमाग में यहीं कुछ दो तीन चीज़े चल रही। पहली कि बस इस साल नौकरी लग जाए। जीवन में इतनी उथल पुथल चल रही कि ज़िंदा रहने कि कोई ख्वाहिश ही नहीं। ऐसे जीने से मरना ही बेहतर है। और तीसरी अपने प्यार को ना पाने का दुख। इन तीनों के अलावा कोई चौथी बात नहीं चलती मन में। लोग कहते है कि जिस के बारे में ज़्यादा सोचो या जिसके बारे में बात कर के सोते है, अक्सर वहीं सपना हम देखते है । ज़िंदगी ना जीने कि इच्छा तो ऐसी हो गई है कि कभी कभी लगता है कि अगर माता पिता की एक संतान और होती तो शायद मैं कहीं दूर चली जाती। नहीं, आत्म हत्या नहीं करती। पर सब से दूर चली जाती शायद कुछ दिन के लिए ही सही। अपने मन कि शांति के लिए। यह सब ख्याल कुछ देर के लिए मन से निकलते ही है कि सच्चाई दिखने लगती है कि कैसे किसी को दिलो जान से भी चाह कर मैंने हार ही अनुभव किया। “अगर पूरी शिद्दत से किसी चीज़ को चाहो तो सारी कायनात आपको उससे मिलाने में जुट जाती है”, यह एक लाइन ना जाने कितनो के मुंह से सुना और इतनी बार सुना कि यकीन हो गया। लेकिन मेरे हाल में कायनात ने भी मुंह फेर लिया, शायद उसे भी मेरी भावनाएं की कद्र नहीं थी। खैर, जीवन का दस्तूर ही यहीं है।

बस यही कुछ दोनों बात सोचते सोचते शायद कुछ 3 बजे सुबह आंख ही लगी थी, की सपने ने नींद तोड़ दिया।
सपना कुछ यूं था कि शाम को अपने क्लास से निकलने के बाद सड़क पर मैं चल रही थी और मुझे रोड के उस पार जाना था। एक राज़ की बात बताऊं तो रोड क्रॉस करना नहीं आता मुझे अभी भी। दिल्ली में तो अगल बगल किसी को कह देती थी अंकल आंटी रोड क्रॉस करा दो, दरभंगा आ कर यह आदत छोड़ दी। अब खुद आंख बंद कर के क्रॉस कर लेती हूं। बस मैंने अभी पांच कदम ही आगे बढ़ाया था कि एक तेज़ रफ्तार में आती हुई बस ने मुझे मार दिया। कुछ दो सेकंड में ही समझ नहीं आया क्या हुआ। सब धुंधला सा दिखने लगा। चारों तरफ भीड़ जम गई। कोई कहीं फोन लगाए,कोई मेरी जेब टटोल कर शायद मेरा फोन ढूंढ रहा था कि मेरे घरवालों को बता दे। क्यूंकि हादसा मेरे इंस्टीट्यूट के करीब हुआ था, कुछ लोग शायद वहां बताने पहुंच गए। मुझे कानों में आवाज़ आ रही थी लोगो की नहीं बच पाएगी यह।

उस एक क्षण आपसे पहले मम्मी पापा का ही ख्याल आया था। आंखो के आगे अंधेरा गहरा छाने लगा था। पर अपनी आंखे बंद करने से पहले हल्की सी ही एक छवि आपकी देखी। आप भागते हुए आए तो ज़रूर थे लेकिन देरी कर गए। इससे पहले आप कुछ कहते, मैं कुछ कहती सब ख़तम हो गया। आपको देख कर आखिरी दफा मुस्कुराना तो ज़रूर चाहती थी, कहना चाहती थी कि बहुत प्यार था आपसे, अगले जन्म ज़रूर मिलना मुझे, पर मैं बेहोश हो गई। बेहोश नहीं, हमेशा के लिए अलविदा कह गई। मेरी चारो ओर हमेशा के लिए शांति हो गई।

मौत का डर इतना भयानक था, की झट से नींद खोल गई। उठते ही मां को देखा तो गले लगा लिया। वैसे यह मैं कभी करती नहीं, तो मां को आश्चर्य हुआ लेकिन उन्हें सपना नहीं बताया। खौफ बैठ जाता है मन में।
शाम को दीपिका को बताया तो उसने बोला कि अपने मौत का सपना देखा तूने, तेरी उम्र और लंबी होगी। वैसे ऐसी कोई इच्छा नहीं है, पर यह सब किसी के हाथ में नहीं होता।

उठने के बाद कुछ खयाल आए। कुछ सवाल के जवाब ढूंढने चाहे मन ने। सोच रही थी जब ज़िंदगी से लगाव नहीं था, तो मौत का सपने से क्यूं डर गई? मुक्ति मिल तो रही थी,तो आज क्यूं ऐसा महसूस करा गया। शायद मौत चाहिए नहीं, बस जीवन से थका हुआ लगता है। और लड़ने की हिम्मत नहीं बची शायद। हारा हुआ महसूस होने लगा है।
वैसे इन सब सवालों के बाद कुछ और बातें आई थी मन में।
पता है आप जवाब नहीं दोगे, अगर दे दोगे तो अच्छा ही लगेगा और मन शांत हो जाएगा।

अगर यह मेरा सपना नहीं; सच होता, तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होती ? क्या आपकी आंखो के सामने मेरा जाना आपकी आंखो में आंसू ला देगा ? क्या आपको तब लगता कि काश एक दफा आपने मुझसेे अच्छे से बात कर ली होती? क्या मेरे मरने के बाद आप लोगो को बता पाओगे मेरे बारे में? क्या आप प्यार का उदाहरण देते वक़्त मुझे सोचोगे ? क्या जब जब सच्ची मोहबब्त या अधूरी मोहब्बत की बातें होंगी तो आपके ज़ेहन में मेरा खयाल आएगा ? क्या मेरी मौत आपको किसी अपने का खोने का एहसास करा पाएगा ? क्या मुझसे कभी नहीं मिल पाने का अफसोस होगा आपको? क्या तब यकीन कर पाओगे कि प्यार ने मुझे बहुत बुरी तरह तोड़ा था ? क्या कभी मेरी याद आएगी आपको ? क्या मेरा लिखा हुआ कभी दुबारा पढ़ोगे ? क्या उन शब्दों में छुपे भावनाएं तब दिल को छू पाएंगी आपके ? क्या मुझे और मेरे इश्क़ को आबाद रखोगे या एक राज़ बना कर दफ़न कर दोगे ? क्या इन सवालों का जवाब कभी दे पाओगे ?

– निधि ❤ (1-2-2019) ( 5:50pm)

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एक ज़िंदगी ऐसी भी!!

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” मां कोई मुझसे बात नहीं करता!”
” मां अब सीमा ने भी दोस्ती तोड़ ली!”
” मां बगल वाली कपूर आंटी आपकी सहेली है ना, आज उन्होंने भी मुझे देख कर मुंह फेर लिया!”
” मां गली में सब मुझे देख कर कुछ कुछ फुसफुसाने लगते है!”
” मां सुन रही हो तुम?”
“मां आज बहुत भूख लगी थी स्कूल में! पर कुछ अच्छा नहीं लगा खाने में!”
” स्कूल में अचानक तुम्हारे हाथों के आलू के परांठे याद आए।”
” मां स्कूल में पता है नाटक प्रतियोगिता है! मैंने भी अपना नाम लिखवा लिया है, पर मेरे साथ कोई टीम बनाएगा या नहीं?”
” अच्छा मां मैं एक सांस में इतना बोलती गई। तुम क्यूं चुप हो? तुम ही कहती हो कि जब मैं घर पर नहीं रहती तुम्हें सुना सुना लगता है घर और अब मैं इतना बोल रही तो तुम मेरी बातों का जवाब ही नहीं दे रही। ”
” जल्दी से खाना लगा दो मां”, मैं आती हूं मुंह हाथ धो कर। ज़रा मेरे लिए पकौड़ी तल देना। आज जी भर पकौड़ी और हरी चटनी खाने का मन है।
यही बोलते हुए मैं यानी पायल घर का दरवाजा बंद करने उठी। ज़ोर से पैर कुर्सी पर टकरा गया और खून निकलता रहा।
मां मां चिल्लाती रही, पर तुम आई नहीं मां। मेरे अनकहे दर्द समझने वाली मां आज कहां गई। मुझे क्यूं नहीं चुप कराने आ रही हो? तुम्हें अपने जगह से हिलना क्यूं नहीं गवारा हुआ मां।
खुद उठते हुए, आंसू पोछा, दरवाज़ा बंद किया और डेटॉल खोजने लगी। आज से पहले तुम ही निकाल कर दिया करती थी। अपने चोट पर पट्टी की। और चुप चाप सोफे पर जा कर लेट गई। आंखो से आंसू बंद ही नहीं हो रहे थे। पता नहीं पैर पर लगी चोट ज़्यादा दर्द दे रही थी या दिल पर लगी चोट।
यकीन करना मुश्किल था जो भी मेरे साथ हुआ था। कहां चली गई तुम मुझे छोड़ कर मां। अकेले इस दुनिया में। कोई कहता है कि तुम मर गई हो! मैं नहीं मानती। तुम हमेशा मेरे साथ रहने का वादा करती थी। आज क्यूं चली गई? कल रात पहली दफा इस बड़े घर पर अकेले रहना पड़ा। बहुत सहम सी गई। स्कूल जाने का मन भी नहीं था । लेकिन सोचा कभी तुम मुझे स्कूल लेने आओ और मैं ही नहीं मिली तो। इसलिए स्कूल भी गई पर तुम वहां भी नहीं मिली।
मौसी पहले रोज़ फोन किया करती थी, जब से तुम्हारे जाने की खबर सुनी है वो फोन नहीं उठा रही। परेशान हो गई होगी ना ? लेकिन उसके बाद कभी भी नहीं किया। क्या हो गया पता नहीं? तुमने कभी दादी, चाचा, बुआ से मिलवाने नहीं ले गई मुझे। आज उनके पास चली जाती। लेकिन वो मुझे पहचानेगे कैसे? और मेरे पास भी उनकी कोई तस्वीर नहीं है।

मुझे नहीं पता चल रहा मेरा कसूर क्या है? कल रात से भूखी ही हूं मैं। क्या तुम्हें मेरा भूखा रहना मंजूर है? पुलिस इतने चक्कर काट कर गए है घर के कि मैं परेशान हो गईं हूं।
पापा का भी नाम पता पूछ रहे थे। मैंने बता दिया पापा मेरे विदेश में बड़ी कंपनी में काम करते है और अमित नाम है उनका। कह रहे थे बात करवाने। तुम फोन भी ले गई मां जिस में पापा का नंबर था। कैसे करवाती बात? पता हैं सारे गली में रहीम चाचा के इलावा कोई मुझसे अब पहले जैसे बर्ताव नहीं करता। सब मुझसे कटे कटे रह रहे। भूख बर्दाश्त नहीं हुई तो गुल्लक तोड़ डाला। पूरे 800 रुपए निकले । रहीम चाचा के समोसे सस्ते हो गए है मां। पहले 10 में 2 देते थे अब 10 में 4 देते है। कहते हैं तू मेरी जान है । वो ही बस मेरी हिम्मत बांधते है। मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया है मां। दस दिन बीत गए। पुलिस वाले अंकल आज फिर आए। कहते है पापा का नाम पता गलत है। ऐसे कैसे गलत है? वो ठीक से ढूंढ नहीं रहे तुझे । मैंने डांट दिया उन्हें। मां वैसे तू कहां चली गई? क्यूं चली गई? पापा भी भारत लौट कर नहीं आ रहे? पापा और तेरी बात होती है क्या फोन पर? मुझे क्यूं छोड़ दिया यह सब सहने के लिए? पुलिस वाले अंकल रोज़ आते है । मेरा अच्छा ध्यान रखते है। कहते है जब तक तुम्हारे पापा मम्मी नहीं आते, किसी भी चीज़ की जरूरत हो तो मुझे कहना।
अब अकेलापन को अपना लिया है मैंने मां। आदत हो गई। तुम लौट के नहीं आई। पापा ने भी मुझे खोजना ज़रूरी नहीं समझा। मैं हमेशा कहती थी पापा मुझसे प्यार नहीं करते पर तुम गुस्सा हो जाती थी और पापा की मजबूरी बताती रहती थी। फिर क्या? तुम्हारी बात माननी पड़ जाती थी।

आज मन बहुत परेशान हुआ था मां। सोचा कपूर आंटी के पास जाऊं। वैसे उन्हें अब मैं पसंद नहीं पर तब भी चली गई। आंटी मुझे देख कर थोड़ा घबरा सी गई थी लेकिन अंदर आने को बोली। आज इतने दिन बाद किसी ने चाई बना कर पिलाई अदरक वाली। तुम्हारी याद आ गई। मैंने पूछा आंटी मां क्यूं चली गई, कहां चली गई? कब आएगी?
आंटी के आंखों में आंसू आ गए। आंटी कुछ कहने ही वाली थी कि बगल वाले रमेश भैया आ गए। मुझे देख कर चिल्ला उठे और बोले “आपने इस नाजायज़ को अपने घर कैसे आने दिया?” नाजायज़ कैसे हुई मैं मेरे तो पापा मम्मी दोनों है। लेकिन चुप चाप से उनके घर से निकल गई।
घर आ कर लोगों की फोन नंबर वाली डायरी ढूंढी। कुछ ही लोग का नंबर था। भागे भागे गई रहीम चाचा के पास। उनसे फोन मांगा और लगा डाला सब को फोन की कहीं कोई खबर मिले तुम्हारी। कुछ तो पता चले तुम्हारा। मां बाप होते हुए अनाथ जैसा आज महसूस हो रहा था। रहीम चाचा को सब बताया। वो बोले पुलिस के पास चलने।
पुलिस वाले अंकल मुझे अस्पताल ले कर जाना चाह रहे थे तुमसे मिलाने। पर आज तुमसे मिलने से ज़्यादा ज़रूरी कुछ था। उनको बोला आप मुझे मेरे पापा के पास ले जा सकते हो? रहीम चाचा और पुलिस वाले दोनों ही चकित हो गए। आज मां से ज़्यादा ज़रूरी था पापा से मिलना। मान गए और ले गए उनके घर। मुझे वहां देख कर पापा को झटका लग गया। उन्हें देख कर गुस्सा आना चाहिए था पर आंखो से आसूं आ गए। बहुत दिन बाद किसी अपने को देखा था। रोना आना लाज़मी था। पर इस बार मेरे आंसू देख कर वो कुछ नहीं बोले।
” पापा, मां बहुत दिन बाद मिली! कोमा में चली गई है। आप कहां चले गए थे। भारत आए तो मुझसे मिलने भी नहीं आए। चलो मेरे साथ ” और मैंने अपना हाथ बढ़ाया।
मुझे नहीं जाना कहीं और मुझे पापा कहना बंद करो। तुम्हारी मां को बहुत शौक था तुम्हें जन्म देने का तो अब भुगते। मैं तुम्हें कभी नहीं चाहता था।
पापा ने तुमसे प्यार का खेल खेला था। शादी नहीं की तुमसे। तुम्हें झूठे उम्मीद दिखाते रहे। बस फोन पर इस वजह से संपर्क रखते थे। और चले गए तुम्हे छोड़ कर एक दूसरी औरत के साथ। मुझे और तुम्हे ऐसी हालत में ही छोड़ कर हमेशा के लिए। तुम्हें जब सब पता चला तो तुम चली गई मौत को गले लगाने। पर बच गई। कोमा में चली गई। मुझे नहीं यकीन हुआ। क्यूं करती यकीन ? तुम मुझे कितनी अच्छी बातें बताया करती थी पापा के बारे में। वो भी कितनी बात किया करते थे। नहीं कर पा रही थी यकीन। पर आंखो का देखा और कानों का सुना कैसे झुठला देती। चुप चाप आ गई अस्पताल। तुमसे बहुत कुछ कहना था पर वहां भी डॉक्टर ने पहले सुना दिया कि तुम्हें नहीं बचा पाए। अब मेरे जीवन में बचा ही क्या था? रहीम चाचा और पुलिस वाले अंकल के आंखो में आंसू थे। पर रोना तो मुझे चाहिए था। पर रो ही नहीं पाई। लगा जैसे एक ही क्षण में दिल की सारी भावनाएं मर गई। एक ही झटके में अनाथ और नाजायज़ दोनों ही हो गई। आज गली में लौटी तो सब सहानुभूति आंखो से देख तो रहे थे पर कोई गले लगाने नहीं आया। एक अनाथ के साथ सहानुभूति थी उन्हें पर एक नाजायज़ से घृणा। इतनी बड़ी दुनिया में कोई भी अपना नहीं रहा। कोई भी मुझे अपनाने के लिए तैयार नहीं था। मेरे नाजायज़ होने की बात सुन कर राहुल ने भी मुझसे रिश्ता तोड़ दिया। इस बात का भी मलाल नहीं हुआ। क्या पता भविष्य में राहुल वो ही करता जो पापा ने आपके साथ किया और मैं भी एक नाजायज़ बच्चे को जन्म दे देती।
घर को ताला लगा कर पुलिस वाले अंकल मुझे अनाथाश्रम ले गए। अब से वहीं से जीवन की नई शुरुवात होगी। लेकिन रोज़ ज़हन में एक ही ख्याल आता है कि मैं क्या बुलाऊं खुद को “अनाथ” या फिर ” नाजायज़” ?

– निधि ❤ ( 3-1-2019) (9:00pm)

BACHPAN KI HOLI

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Holi, the festival of colours is not only for colours but it is also the festival of love and happiness. The festival brings joy in every house as well as in everyone’s life. No matter what class the person belongs to or what is the age of the person everyone enjoys the festival fully. The only thing which matters for everyone is food, colour and get together. Among all the festival, I like Holi a little more if compared to other festival because only in Holi the whole large family get together can be done from morning to night. Since childhood, Holi is one of my favourite festival. During my chilhood days, I was the naughty one in the whole family. Every elder had to run behind me. My mother used to hold my hand everytime. As soon as she used to leave my hand for a minute, Rajdhani would develop inside me and I used to start running. Four people would run behind me to catch me so that I don’t fall. I completely used to enjoy this moment. Like all other days I did the same on Holi. I did not like when some one applied colours on me. But I completely loved when I used to apply colours on others. 😉 I was too small to understand thing at that time. I saw everyone applying colours on each other. My father had bought me a water gun and taught me how to use it. I was loving it completely. I was splashing colours and waters in everyone. My mother had prepared delicious gujias, malpuas and many other items. While the colours applying ceremony was going on, I asked my mother to whom should we apply colours.
” To every people we know or we don’t know we can apply colours. It is the festival of colours and sharing love. ” My mother said.
” Bura na maano holi hain.” My neighbour came and applied colour on my mother face.
I understood that we can apply colours to everyone. So I went inside and applied colours on Alisha, Monu, Suzain and all other of them. The funniest part is Alisha Mini and Suzain were my soft toys and dolls. I loved them so much and I thought not to leave them alone in festival. I took them to everyone and told them to apply colours on them too as they are part of family. Everyone loved my innocence and applied colours at that time. Till date,on every Holi my family tease me about this sixteen years old memory.
“Childhood memories are always memorable. “
This was the most funniest, enjoyable Holi of my childhood. Wishing everyone A very happy Holi !

“I’m pledging to  #KhulKeKheloHoli this year by sharing my Holi memories at BlogAdda in association with Parachute Advansed.”

Nidhi

HOLI : FESTIVAL OF ENJOYMENT

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” We will get caught. ” I said.
” Oh! Please,we won’t. ” My friend Samira said.
” Yeah, Nidhi is right. What if we get caught? ” Manvi spoked.
” Please, this will be last year of our school. ” Samira requested.
” OK Done! We will do the same as we decided. ” I said.
” Inform our whole group. ” Manvi said.
Actually, one random day before holi in our free period we had decided that we will play holi in school. Although knowing that our school is strict and we can be severly punished for playing holi in school.But then when our group decides one thing we do it at any cost. We had planned to play holi on the last day before holi holidays. We went to market and brought different colours. 
We even brought sweets so that we can even convence our teachers. Our group consisted of four boys and three girls. We always shared each and every plan and no body changed it. So as per the plan it was only the students who would play holi. That day we attended all the classes quietly. Even teachers were surprised by our so much attentiveness in the class. Even one teacher doubted us too but we handled it. So it was decided that during our last period we would play holi with whole class. It would be dry holi but an unforgetable one. It is rightly said that when you are doing wrong even your name is called for right thing,you get scared. My friend Manvi, the class monitor was called by the classteacher and was handed over the notice. When she came to class and announced the same we were in the situation that we are dead.
” If any children is caught with colours or playing holi in or nearby school they will be severly punished. The bags can be checked anytime and if even a single pouch of colour will be found it would be very bad for the children.” Manvi read out the notice.
We all were scared. I knew how our principal was and if we would be caught by chance no doubt we will be killed. I was the most favourite child of my computer teacher and I decided that it is the time that we must share this with her. It was difficult to convince the whole group but everyone knew that there was no choice left. I shared everything with my teacher as she was more a friend to me. She did not believe at first that I was the part of such a plan but then I said ” Dil toh baccha hai ji” which made my teacher laugh alot.
” Deposit the colours to me. I will speak to the principal and rest of the teachers. I won’t think you people would get permission. ” My teacher said.
All the excitement inside us was dead. Our bags for checked and nothing was found. It was the last period when we were about to play holi but till then also no message came from our computer teacher. We were packing up our bags when there was announcement from school ground that all the students of class 10th should remain in the school campus. We were now scared but we decided that we will be together. When the whole campus got emptied we went to the ground.
” You people are allowed to play holi with your classmates along with your teachers. But remember no water. ” My principal spoke up.
We were overjoyed and hugged each other in excitement.
We played dry holi. We clicked pictures. We enjoyed a lot and shared sweets. And yes, it was all because of our computer teacher so she became the most colourful personality in the school campus. This became the most memorable holi of my school life or I must say teen life.

“I’m pledging to #KhulKeKheloHoli this year by sharing my Holi memories at BlogAdda in association with Parachute Advansed.”

Nidhi

A LOT CAN HAPPEN OVER COFFEE

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” I am angry on you. ” Shruti texted Abhi.
” I am sorry. ” Abhi replied.
” You know how much I love coffee. And you cancelled going with me. ” Shruti was seriously angry. She was sitting quiet in her room. She was sad.
There was a knock at the door. She opened. She was surprised to see Abhi with two cups of coffee. A wide smile covered Shruti’s face.

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“Taste it.” Abhi winked.
“This one is different. ” Shruti appreciated.
” Its because this one is made by me. ” Abhi said.
Shruti could not believed but then when Abhi pinched her , she shouted and realized she was in reality.
” A LOT CAN HAPPEN OVER COFFEE. “ 😉

Nidhi

MY DREAM SUNDAY

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” SUNDAY “,the most lovable day for all the person whether they are student or office going people or they are housewives. Yes, you heard it right, even for house wives because everyday they have to wake up early to pack lunch and prepare breakfast before other family members wake up. But on Sunday they can sleep peacefully.
Being a Student, I love all holidays, but “Sunday” has a special place because only on that day the whole family is together. A family can spend time together only on Sunday’s. Sunday can only be perfect when everyone enjoy’s the day and till the last minute of the day everyone keep on smiling. On Saturday night, I would invite some of my very close relatives like my Bua’s and Mausi’s with their families.
To be very honest, I haven’t spent one such perfect Sunday with my family. With my friends,I have spent numerous Sunday’s.
My perfect Sunday would be when everyone in the family can wake at whatever time they want but before ten. Inside the heart everyone wishes to sleep a little more but are bounded by duties. After waking up first I would order the breakfast from outside.Ofcourse of everyone’s choice. Till the time everyone gets ready the breakfast would surely arrive. After having breakfast I would make everyone sit and together the whole family would watch a comedy movie. Yeah ! Comedy only because my purpose is to keep the smile on everyone’s face till the day ends. Emotional movie brings tears to eyes.
On Saturday only, I would have bought chips , cold drinks, ice-creams so that none has to go out to market. With chips and cold drink we would enjoy the movie. After the movie, I would order the lunch. Yes, of everyone’s choice. After having delicious lunch,I would love to play some indoor games like Antakshari, Ludo,Carrom etc. After that in evening we would go to nearby park and enjoy the surrounding. We would roam and till seven we would return back to home. As parents don’t like too much junk food, I would tell them to go home and I would join with my cousins after some time. We would enjoy the evening. As being elder even they would need some space, we being teenagers we would need some. From Golgappa competition to any other competition we would do all of them. While returning home,we would get pack the dinner. The evening would be dedicated to gossips and checking each other mobiles .😛
After lunch, I would give everyone a piece of paper and they have to write about one person among present there why they admire them the most.
The person about whom most person would have written would be the King or Queen of the day. With the sweetness of Ice- cream I would end the day.
I know all the mother’s present there would have surely loved it because it would be first time when there would be so many guest but still they do not have to go inside kitchen for cooking.
Cousins would thanks me for the memorable evenings.
All the father’s would thank me for making them realise that how much their wife work whole day and even if she get holiday’s on Sunday she would also be happy.

” A single day well spent with family can make the whole week happy. ”

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.

Nidhi

McCAIN : YOU SAVED ME

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If someone ask me about my love in things, I instantly reply them i.e FOOD.
Yes, you heard it right, I love food.
Remember not just food, it should be delicious too. Mark my words, I love Delicious food.I am blessed with the most wonderful cook at my home. She is none other than my mother. Honestly, once you will have food prepared from her hand, your stomach will get full but the desire of having more won’t die.
I had heard about Mac products but as I live in a small city, it is never available in my city. One random day, we got a call from my aunt, that my uncle is ill and we need to rush. My father immediately booked two tickets to Delhi. My mother could not accompany us as we caould not leave grandmother alone. After a two days tiresome journey, we reached to their place. My aunt had prepared lunch for us. I knew she wasn’t a good cook,but when I had lunch I came to know she was the worst cook. I missed my mother. I quietly gulped whole food. We went to the hospital. After meeting my uncle, my father decided to stay there and said he will have dinner in canteen. He told me to take an auto and go home. When I came out of hospital, and after walking for a while, I saw Mc Donalds. I was very happy and I remembered a video my friend sent me long back. I found the video so cute that even after so many year, I did not delete it.

I went inside and as per video I started with McAloo Tikki. Trust me, it was awesome. I was going through the menu and I wished to have McBurger too. I ordered and my tummy got full.
While moving out the waiter told me to have a look at their Mac Store once. I was so much attracted with the taste that after paying the bill, I went there.
I purchased McCain French Fries, McCain Chilli Garlic Potato Bites, McCain Potato Cheese Shotz, McCain Cheese and Jalapeno Nuggets and McCain Smiles. I had a 1000 volt smile on my face.
My tummy was already full so I told my aunt not to prepare dinner for me.
Next morning, I woke up early and told that I would prepare breakfast. I started with McCain Potato Cheese Shotz. Within ten minutes, I presented the breakfast. Everyone praised it. I told my father while incident. The man who always scolded me not to have junk food told me to buy more packets so that we can take them to our home.
The whole three days in Delhi,I relied on Mac products. Every item was delicious. I got saved from worst food of home. From breakfast to dinner I used to eat those snacks. I even went to McDonalds again and ordered to pack two burgers with aloo tikki for having them in train.
This happened three years back, when only we had one smart phone at home and that was with my mother so I could not click pictures.
Thanks to INDIBLOGGER for hosting this contest that I am able to write my experience with McCains products.

This post is a part of http://www.mccainindia.com/

Nidhi