ज़िन्दगी और अनुभव ।

Standard

ज़िन्दगी आज कल कुछ ऐसे भाग रही जैसे पता नहीं कौन सी गाड़ी पकड़नी हो । कितना भी थक जा रही, टूट जा रही पर चले ही जा रही। मंजिल तक तब भी नहीं पहुंच पा रही। अंत तक निराशा और हार ही मिल रहा। आज बरसो बाद बहुत हारा हुआ सा महसूस हो रहा है। शायद इस महीने का असर हो। वैसे ही मुझे यह अप्रैल से जून तक का महीना कुछ पसंद नहीं आता। हर साल जैसे ही इनका आगमन होता है मुझे मेरे पूराने दुःख याद आ जाते है। जैसे ही बच्चों को देखती हूं उत्सुक आंखों को कंप्यूटर स्क्रीन पर गड़ाए हुए की जिस पल ही परिणाम घोषित ना हो जाए, मुझे 2013 वाला अपना वक्त याद आ जाता है। याद आता है कैसे मैं भी एक बार इन्हीं बच्चों की तरह उत्सुक सी रहती थी। अपने नए कॉलेज की सारी तैयारी तो ऐसे कर रही थी कि जैसे किसी घर में बेटी व्याह हो। कोई भी कमी ना रह जाए। दो महीनों में जितने सपने बुने सब जून महीने ने छीन लिया। दिल्ली को ही अलविदा कहना पड़ गया था तो अब काहे का कॉलेज और काहे की तैयारी। ठीक वैसा ही अनुभव हो रहा है अभी। स्कूल से बहुत भागना चाहती थी। आज लगता है वही वक्त सही था। बेफिक्र हो कर पढ़ने वाला। ऐसा नहीं था कि पढ़ाई का बोझ तब नहीं था। पढ़ाई की चिंता तब भी उतनी ही थी। पढ़ाई तब भी उतना ही सताती थी पर अब तो पढ़ाई हर रात सवाल पूछती है कि कितनी निष्टा से मुझे आज किया ? जवाब पता नहीं। कोशिश तो ज़रूर की थी पर फ़िर हार ही अनुभव हुआ तो फायदा ही क्या। उलझा के रख दिया है खुद में इसने। चारों तरफ़ किताबों का ढ़ेर जरूर होता है पर उस में लिखा कितना समझ आ रहा यह तो खुद को ही समझ नहीं आ रहा। किस तरफ पूरी निष्टा बना के रखूं पता नहीं !अब लगता है पूरी तरह थक गई। सुना था कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती पर मेरे जीवन में लगता है यह कहावत भी झुठला रही है खुद को। पहले बस शरीर थकता था , मन नहीं। हौसला बुलंद था। अब सब तरफ़ से हारा हुआ ही अनुभव होने लगा है। मन से इतना थक गई हूं कि शरीर की थकावट पता ही नहीं चलती। चौबीस घंटे में जो घंटे नींद में रहती हूं तब ही शायद शांत रहती हूं। नहीं तो बाकी समय तूफ़ान ले कर ही चलती हूं। खुद के अंदर एक दुनिया समा रखा है जो कितना उजड़ा है वो बस खुद ही जान रही। खैर आज कल ज़िन्दगी बिल्कुल मशीन जैसे चल रही है। आधा समय यह गणित के सवालों को सुलझाने में बीत जाता है। वो सवाल भी ज़िंदगी के उलझनों जैसा हो चुका है सुलझते ही नहीं । एकदम ज़िद्दी से खुद ना सुलझने की कसम खा रखी हो जैसे। खैर 2019 में,शायद मैंने बहुत बदल लिया खुद को। खुल कर हसना, दिलो जान से खुश रहना , बेफिक्र हो कर रहना , यह सब अब दिखता ही नहीं।

परेशान क्या कर रहा है यहीं समझ नहीं आ रहा। इतनी निराशा सी क्यूं छा गई है जीवन में पता नहीं? इतनी बेरंग सी जीवन क्यूं बीता रही वो भी पता नहीं? करना क्या है, कर क्या रही, कहां जाना है, मंजिल क्या है, सपने क्या थे, पूरा क्या कर रही? किसी सवालों का जवाब नहीं है।
मन की बात कहना तो चाहती हूं पर कहूं क्या वहीं नहीं पता। सुनना भी चाहता है कोई या नहीं, यही बड़ा मुद्दा है। कुछ जो शायद समझ कर सुलझा पाते परेशानी को उन्हें अब मेरी बातें ही कहानी लगती हैे और यहीं बातें इतनी बुरी लग जाती है मुझे कि समझ ही नहीं आता की क्या प्रतिक्रिया दिया जाए ! यकीन करने में भी वक्त लगता है। ऐसा लगता है मानो यह सब सच नहीं बस एक बुरा सपना हो। हम अपनी उम्मीदों की दीवार को इतना बड़ा कर लेते है और इतना भरोसा कर लेते है दूसरों पर की मानों वो दीवार जुड़ते जुड़ते एक दिन घर जरूर बना लेंगी। पर हक़ीक़त सोच से काफी परे होती है। वो दीवार तो इतनी कच्ची होती है कि जैसे ही एक धक्का लगे उस पर तो वो छन से टुकड़ों में टूट जाए। आंखों के सामने तहस – नहस कर देती है सब। वो दीवारों की ईट मानों हर एक उम्मीद जैसी दिखती है, जो बस यूं ही बिखर गई। तकलीफ़ किससे हुई , लोगों के कहे शब्दों से या फिर जिसने कहा उससे इसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं थी उससे यहीं समझ नहीं आता। भावनाओं में उलझ कर, कौन से धागे सुलझा रहे पता ही नहीं। और क्यूं सुलझा रहे जब वो धागे खुद सुलझना ही नहीं चाहते। सच्चाई सब पता होती है, दिख भी रही होती है पर स्वीकारना इतना मुश्किल होता है कि हम खुद को ही खो देते है। बहुत मजबूत दिल लिए फिरते है पर कभी कभी एक छोटी सी बात दिल मानने को तैयार ही नहीं होता। ज़िद है ऐसा भी नहीं, बस टूटता हुआ खुद को देख नहीं पाता है। पर जिसका टूटना ही तय हो उसको कितना संभाला जाए। कभी कभी एक इंसान का दूसरा रूप भी देखना जरूरी होता है ताकि खुद को भी समझाया जाए। अब चुप चाप बैठ अपने आस पास लोगों की बातें सुनती हूं, उनके टूटे अल्फाजों को जोड़ उनकी जीवनी जानती हूं। गौर से देखूं तो अधिकतर मनुष्य खुद में टूटा हारा है पर जी रहा है ; आस में। अकसर लोग मुझसे ना भी कहे तो मैं देख कर समझती हूं। कोई खुद कहना चाहे तो मैं सब सब्र से सुनती हूं क्यूंकि नहीं कह पाने का गुठन मुझसे बेहतर कौन समझेगा ? कुछ नहीं तो सामने वाले का मन ज़रूर हल्का होगा इसलिए कोशिश करती हूं हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ले कर आऊं !यह किसी ने सच ही कहा है आज के दौर में भावनाओं की कोई क़दर नहीं । किसी के लिए जी जान से कुछ भी कर दो उन्हें बस सब कहानी लगती है। लोगों को कहना भी कुछ ग़लत नहीं है इतनी कहानी लिखने लगी थी पिछले दिनों की लोग मेरी हर एक भावना को भी अब कहानी ही समझ बैठते है।

वक्त और किस्मत जब तमाचा मारती है तब शोर नहीं होता पर चोट बहुत तेज़ की लगती है और उस चोट की तकलीफ़ शायद ही कोई कभी भर पाए .! अब कुछ कहना चाहूं भी तो चुप रहना ही बेहतर समझती हूं ताकि कोई मेरे जीवन को ही कहानी ना समझ बैठे !

Nidhi

Advertisements

एक आखिरी मुलाकात हमेशा के अलविदा से पहले

Standard

हम इंसान कितने ही बेवकूफ होते है या यूं कहूं सच्चाई स्वीकार करना ही नहीं चाहते। दो साल तक एक तरफा प्यार की यादें ही ले कर जी रही। हमारी मुलाकातें, हमारी वो दो मिनट की बातें ही इतनी ज़्यादा समा गई मुझ में की उनके सहारे ही दो साल बीता लिया मैंने। तड़पती तो हर एक पल थी की देखूं आपको कैसे भी पर मजबूरियां का बोझ कुछ ज़्यादा ही था । चाह कर भी नहीं आ पाई। यकीन करिए यूं आपकी गलियों से जितनी दफा गुजरी मन में सिर्फ एक ही आस रहती थी काश आपको देख लूं। पर भगवान भी शायद मेरे सब्र का इम्तिहान ले रहे थे। दिखते ही नहीं थे आप। आखरी बार मई 2017 में देखा था आपको। उसके बाद बस आपकी तस्वीरों को देख कर ही खुद को संभालती रही। उस दिन इक्तेफाक से आपके दफ्तर आना हुआ।

पूरे 565 दिन यानि 13,560 घंटे, मतलब 8,13,600 मिनट, मिला जुला कर 4,88,16,000 सेकंड बाद आई आपके दफ्तर। पूरी आशा थी कि आज आपसे मुलाक़ात होगी ही। एक मिनिट ही सही जी भर कर देख तो लूंगी आपको। पर अफसोस किस्मत ने फिर धोखा दे दिया और आप नहीं मिले। निराश मन से लौट आई घर। घर आने के बाद बात हुई आपसे । कुछ अच्छा तो नहीं लग रहा था लेकिन संभाल लिया खुद को। इस उम्मीद के सहारे की जल्द ही तो आपसे मुलाक़ात होगी। यही कुछ 5-6 दिन की तो बात है। अफसोस ये उम्मीद भी टूट गई मेरी। आपने कहा जब मैं कहूंगा तब आना। दुविधा तो हर बार मेरी इस ही बात की रहती है कि आपको याद भी रहेगा मुझे बताना या नहीं। कभी आप भूल गए तो? सच बोलूं हर दफा खुद पूछना भी अच्छा नहीं लगता। कभी आप मेरे सवालों से परेशान हो रहे हो? कभी गुस्सा आ जाए आपको तो? कभी चिल्ला उठे मुझ पर ? बहुत डर लगता है ये सब सोच कर। मैं गलती आपकी भी नहीं देती हूं क्यूंकि आपकी व्यस्था ही इतनी रहती है। कहां आप अपने जीवन के महत्वपूर्ण बातों में मेरे सवाल को याद रखोगे ? फिर भी दिल के हर एक टूटे हुए कर्णं में एक छोटी झूठी उम्मीद के सहारे जी लेती हूं।
कभी कभी आप मेरी उम्मीदों पर खड़े भी उतर जाया करते है। लेकिन कहते है ना हम मनुष्य कभी भी संतुष्ट नहीं होते। वो ही कुछ मेरा भी हाल रहता है। हर बार कुछ बातें और कर लेने की इच्छा रहती ही है। खैर किसकी आज तक सारी ख्वाहिशें पूरी हुई है? और मेरी थोड़ी किस्मत में वैसे ही डिफेक्ट है। जो जो जब जब चाहा है वो पक्का नहीं मिला है।

10 जनवरी को वक़्त था ठीक दोपहर के 12:54 जब आपको देखा मैंने पूरे 602 दिन बाद, 14,448 घंटे बाद । सच मानो दिल कर रहा था थम सी जाऊं वहां और अगल बगल ना हो। आप सामने और मैं एकटक निहारते हुए आपको। बिल्कुल भी नहीं बदले आप। वहीं कोट, वहीं व्हाइट शर्ट, वहीं सिल्वर घड़ी, वहीं कोट के ऊपर वाली जेब में पेन का रखना। दिल को ऐसा सुकून मिला कि शब्द कम पड़ जाएंगे। हमेशा यूं ही कल्पना करती थी कि जब आपको देखूंगी तो जी भर के देख लूंगी पर जब आप सामने आए तो आंखे झुकी की झुकी ही रह गई। एक ज़रा सा हिम्मत कर के मुस्कुरा पाई । बुखार तो ऐसा गायब हुए और शरीर ऐसा ठंडा पड़ा कि खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि क्या हो रहा। दिल की धड़कने ऐसे भाग रही हो जैसे मेरी तो यह कभी थी ही नहीं। जाते दफा उस दिन आप फिर मिले। इतने करीब खड़े थे कि खुद को काबू करना मुश्किल था, बहुत ज़्यादा। वो ही डियो लगाते है अब भी आप। अब जिस इंसान की मैं परछाई भी पहचानने लगी हूं उसके बारे में इतना ज़्यादा ज्ञात होना लाज़मी भी है। बहका जाते है आप अक्सर मुझे।

मिलने का सिलसिला रहने वाला था। मेरा दिल कुछ दिन के लिए फिर खुश होने वाला था। पर इस बार बहुत डरी हुई थी मैं। क्यूं ? इसके बाद हम शायद कभी नहीं मिलेंगे। आप के दफ़्तर आने के बहाने भी काम नहीं करेंगे। देखने की इच्छा होगी तो क्या करूंगी ? मिलने का मन होगा तो इस बार तो मौका भी नहीं मिलेगा।

आपसे मोहब्बत क्यूं कर बैठी इसके तो बहुत जवाब है मेरे पास। पर कब कर बैठी यह तो खुद को भी एहसास नहीं हो पाया। शायद तब जब आपसे कोई बहस कर रहा था और आप चुप रह कर बात ख़तम कर रहे थे । आप के पास अधिकार था उसको मार बैठने का मगर फिर भी आप ने बहस नहीं करना बेहतर समझा। उस समय आपके शांतिप्रिय स्वभाव पर दिल हार बैठी थी मैं। या शायद जब आपने पहली बार मेरी समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की थी। बहुत अपनापन सा महसूस करा बैठते है आप। शायद तब भी दिल में कुछ महसूस सा हुआ। जब पहली बार आपको अपना लेख भेजा था और आप इतने प्रभावित हो गए की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। सच कहूं उस लेख से अपने मुझे भी प्यार हो गया है। वैसे आप लेख की तारीफ कर रहे थे यह नहीं समझे की आपके लिए ही लिखा था पर तब भी आपने पढ़ा था इसकी बहुत संतुष्टि थी।

भले ही आपने कभी बताया नहीं तब भी मुझे पता है कि कुछ महीने आप 4:45 am सुबह उठ जाते हो और कुछ महीने 6 बजे के बाद। रात में सोने का समय शायद 12 महीने एक जैसा ही है। हमारी कितनी ही दफा सुबह बात हुई। सच कहूं बहुत मुश्किल होता है इतनी सुबह उठ बैठना। पर आपसे एक झलक बात हो जाए उस आस में उठ जाती हूं। पता है कि दफ़्तर से आने के बाद आप बहुत थका हुए महसूर करते होंगे इसलिए नहीं कर पाते बात। मुझे आपके व्यवहार से प्यार हो गया था और कभी आपकी बातों से। आपका मुस्कुराता चेहरा ज़ेहन में कैद कर लिया था। कभी कभी आपसे मैं इतनी फ़िज़ूल प्रश्न पूछ बैठती हूं कि बाद में खुद पर हसी आती है। लेकिन बेसब्र दिल करे भी क्या ? मैं इतना नादान जैसी हरकतें भी कर सकती हूं मुझे पता नहीं था। सच बोलूं अनजानों के सामने आपके बारे में बात करने में कतराती हूं मैं। कहीं यूं ना हो कि कोई आपका नाम ले और मेरे गाल झट से लाल हो जाए। चेहरे पर इतनी बड़ी मुस्कान छा जाती है। कभी किसी ने पकड़ लिया तो? मैं अपने इश्क़ के बारे में सबको नहीं बताना चाहती। नहीं चाहती सब जाने मेरे मन के राज को। आप मेरे हो तो नहीं, फिर भी आपको खोने का डर इतना ज़्यादा है कि कभी कभी आधी रात को नींद खुल जाता है इस भय से। आपको अपने मन की बात कहने कि हिम्मत जुटाई।

बहुत बार मैंने आपको कहा होगा कि ‘एक बात पूछूं ‘ या फिर ‘ एक बात बोलूं ‘ और जैसे ही आप हां बोल देते पता नहीं हिम्मत कहां मर जाती है। कुछ और ही पूछ बैठती हूं। आपसे एक दफा पूछा कि आपको गुस्सा भी आता है? आपने जवाब में हां बोला तो मानो मेरी हिम्मत ख़तम सी हो गई। वैसे आज तक आपने मुझे कभी डांटा नहीं , पर कभी डांट देंगे तो। आपका छोड़िए , खुद का भी सामना करना मुश्किल हो जाएगा मेरे लिए। कैसे कदम बढ़ा पाऊंगी आपकी ओर ?

पता है जब आपके सामने होती हूं तो सब से छुप कर, आपसे भी चुरा कर आपको जी भर देखती हूं। बस वहीं तो कुछ पल मेरे अपने है। जैसे ही आपकी नज़र मुझ पर पड़ती है मैं झट से हटा जाती हूं। जिस दिन आपसे बात और आपसे मिलना दोनों हो जाए उस दिन अगर जग के लिए अमावस्या भी होती है तो भी मेरे लिए पूर्णमासी होती है। सब के सामने मुझे आपसे बात करने में घबराहट सी होती है। नहीं कर पाती। बस यहीं कुछ चंद मैसेज में जीवन सिमटी है

मैं कभी ऐसी सी भी हो जाऊंगी मुझे खुद विश्वास नहीं हो पता। ” प्यार व्यार सब बेकार की चीजें है ” यह एक लाइन मानो मैंने कितनी दफा कितने ही लोगों को बोली होगी और आज खुद ऐसा एकतरफा इश्क़ हो गया जैसे की उससे निकलने का या तो जी नहीं चाह रहा या हिम्मत नहीं जुटा पा रही। बहुत बार सोचा था एक बार बोल डालती हूं और मामला ख़तम। लेकिन कहीं मामला और गहरा ना हो जाए। इस बात का तो पूरा यकीन है मुझे की आपको ना मुझसे कोई लगाव है और ना कोई प्यार। आपको एक ज़रा फर्क नहीं पड़ेगा कभी मैं यूं अचानक गायब भी हो जाऊं तो! फिर भी पता नहीं क्यूं इतने ज़रूरी हो गए आप।

समझ नहीं आता कैसे संभाला जाए खुद को? खुद से ही सवाल पूछती हूं, खुद में जवाब ढूंढती हूं। खुद से लड़ती हूं, खुद से तंग आ जाती हूं। खुद में बेचैन रहती हूं। खुद को तकलीफ़ में देखती हूं। खुद पर दया आती है। खुद को इतना असहाय मानती हूं। इतना मजबूर शायद कभी नहीं हुई थी मैं !!!

शायद इतना इश्क़ भी पहले नहीं हुआ था ना। वैसे एक बात के लिए मैं हमेशा आपकी शुक्रगुजार रहूंगी और वो यह की आपकी वजह से मैंने हिंदी लिखना शुरू किया। आपने एक बार यह क्या कहा कि हिंदी में लिखा करो, मानो मैंने उसे पत्थर की लकीर मान ली हो और बस हिंदी का दामन ही थाम लिया हो। मुझे बहुत आश्चर्य होता है जब मैं अपनी राशि पढ़ने से पहले अापकी राशि पढ़ती हूं। कभी कभी आपको भेज भी देती हूं। वैसे आपने बताया था कि आपको थोड़ा बहुत ही यकीन है इन सब पर तब भी कभी लिखा सच हो गया इसलिए भेज डालती हूं।

मुझे पता है कुछ महीने बाद शायद ही हम मिल पाए। शायद तब जब मेरी भी नौकरी लग जाए तब शायद एक बार मुलाक़ात हो। ज़रूरी नहीं पर की होगी ही। आप तब इस शहर में नहीं भी हो सकते। खैर, भविष्य किसने देखा है इसलिए सोचा हमेशा के लिए अलविदा कहने से पहले एक बार आखिरी मुलाक़ात हो जाए। हां हां पता है हम मिल नहीं सकते बस दूर से देख सकते है एक दूसरे को। लेकिन फिर भी मुझे अपनी दिल की बात कहनी है। इश्क़ कबूल करना है। अब इसका परिणाम जो भी हो मुझे स्वीकार है लेकिन दिल में दबा कर मर जाना मंजूर नहीं। और सुनिए , मुझे अस्वीकार करने की ठानी हो तो हिचकिचाना मत।
सच बोलूं आप मुझे स्वीकारेंगे इसकी कोई आस नहीं थी कभी मुझे। झूठे ख्वाब पालने की आदत नहीं है मुझे। पता ही है कि आपके काबिल नहीं हूं मैं।

बस आपके सामने इश्क़ कबूलने की हिम्मत बांधने में देरी हुई है बाकी मैं बहुत साहसी हूं। हर ग़म सहने की आदत है और वो भी मुस्कुराते हुए। दिल्ली छोड़ने से बड़ा गम मेरे जीवन में होगा आपको खोना लेकिन किस्मत से बड़ा कुछ नहीं हो सकता। और होता वहीं है जो मंजूरे खुदा होता है इसलिए बस एक दफा मुझसे आराम से बात कर लीजिएगा मुझे इतने में ही जीवन भर की संतुष्टि मिल जाएगी।

बहुत चाह है आपको जी भर जानने की। कम से कम जिससे इश्क़ हुआ है उसको पूरी तरह जान तो लूं। आपकी कहानियां को भी जान पाऊं। आपको अच्छी तरह समझ पाऊं। वो हिकिचाहट का पर्दा हटा पाऊं हमारे बीच से। अपनी लिखी बातें कह जाऊं आपको। आपसे आपका पसंदीदा मौसम जानने का जी चाहता है? आपका पसंदीदा रंग? आपका पसंदीदा गीत? क्या आपको भी मेरी तरह धोनी पसंद है या आप किसी और खिलाड़ी को बेहतर समझते है। लेकिन पूछ नहीं पाती। कभी कभी सोचती हूं काश आप ही कुछ ऐसी बात की शुरुवात कर दे कि मैं हौसला बांध पाऊं। आपका गाया वो एक गाना मैंने कितनी ही बार सुना होगा उसका कोई अंत नहीं है। इतनी बार सुना कि आप ने उस गीत को गाते वक़्त कहां कहां तहराव लिया है वो भी याद हो गया है। आपकी हर एक तस्वीर को मानो ज़ेहन में उतार डाली हो। शिकायत भी है आपसे। इतनी तस्वीरें डाली आपने लेकिन कभी मेरे पसंद कि उस हाफ ग्रे जैकेट में नहीं डाले। कितनी दफा आपसे बात करते वक़्त यूं ही बोली होगी यह बात मैंने। पर हर बार आप हस कर टाल देते है मेरी भावनाओं को। एक बार आपने मुझसे पूछा भी कि यह जैकेट की बात तुमने मुझसे कहीं थी। जब मैंने हां बोला तो आपने उस बात को अधूरा छोड़ना बेहतर समझा। आपकी तरह गाना तो आता नहीं । अगर आता तो यह गाना ज़रूर गा देती। ऐसा लगता है कि कौसर मुनीर ने मेरे लिए ही लिखा है यह गाना।

“माना कि हम यार नहीं, लो तय है कि प्यार नहीं
फिर भी नज़रे ना तू मिलाना, दिल का एतबार नहीं ।”

आपके लिए 100 क्रश डायरीज लिख डाली, इतने लेख लिख डाले। लोग मज़ाक उड़ाने लगे है। कहते है किताब ही लिख डालो। खैर पता नहीं आप यह लेख पढ़ेंगे या नहीं और पता नहीं भविष्य में हमारी बात हो या ना हो पर जब जब आप अपनी अलमीरा में टंगे अपनी ग्रे हाफ जैकेट को देखेंगे चेहरे पर एक मुस्कान और मेरी याद आपको दोनों एक साथ ज़रूर आएगी । मुझे नहीं पता आपकी यह सब पढ़ने के बाद क्या प्रतिक्रिया होगी, आप कैसे बर्ताव करेंगे। पर एक जवाब ज़रूर दे जाइएगा। अच्छा या बुरा कुछ भी कह जाइएगा। अधूरी ना छोड़ना इन बातों को। और ना यह कहना की क्या जवाब दूं कुछ समझ नहीं आया। जो मन में आए बोल डालना। खुद को कैसे समझाना है और संभालना है वो मुझे बहखुबी आता है। पता नहीं आपको किस नाम से बुलाऊं, क्रश, मोहब्बत या ज़िन्दगी।
यह जो कुछ दिन हम मिल रहे है ना इसके बाद शायद ही मिले। एक आखिरी मुलाक़ात हमेशा के अलविदा से पहले।

एहसान तेरा होगा मुझ पर
दिल चाहता है वो कहने दो
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई है
मुझे पलको की छाव में रहने दो !

याद है मैंने आपको कहा था एक बार मेरे सारे लेख एक साथ पढ़ने। वक़्त मिले तो पढ़ लीजिएगा । लिंक नीचे डाल दिए है।

1. https://wp.me/p5ircX-fe

2. https://wp.me/p5ircX-ia

3. https://wp.me/p5ircX-jb

4. https://wp.me/p5ircX-jx

5. https://wp.me/p5ircX-jC

6. https://wp.me/p5ircX-jR

– Nidhi ❤ (11-1-2018) ( 11:00 pm )

इंतज़ार आज भी है..

Standard

पहला प्यार, पहली मुलाक़ात, पहली लड़ाई, पहली गुफ्तगू , चाह कर भी नहीं भुलाई जाती। इनकी यादें ज़ेहन में ऐसे कैद हो जाती है कि जितना निकालना चाहो, उतनी गहरी छाप छोड़ जाती है। उन्हीं कुछ पहले पलो में था मेरा आपसे टकराना।

स्कूल में सुबह आठ बजे की घंटी बजते ही सब दौड़ रहे थे अपने अपने क्लास की ओर। स्कूल का पहला दिन। नई कक्षा में नया सफर। वैसे कुछ पुराने दोस्त भी थे साथ पर दूसरे कमरे में। आखिर ग्यारहवीं की पढ़ाई थी। यही से हम अपने सपनों को भरने की उड़ान तय करते है। डॉक्टर बनने का सपना देखा था मैंने भी इसलिए साइंस विषय चुना था। चारों तरफ़ नए चेहरे। जो भी कुछ पुराने थे उनसे पहले आज तक बात करना ज़रूरी भी नहीं समझा था। खैर अब रहना तो था इनके ही बीच। तब ही नज़र पड़ी एक कोने में बैठी एक लड़की पर। मासूमियत उसके चेहरे से झलक रही थी। आंखो में डर था। हो सकता है उसका पहला दिन था स्कूल का। पता नहीं क्यूं उस पर नज़रे को टिकी तो हटी ही नहीं जब तक मुझे मैम की आवाज़ सुनाई नहीं दी जो मेरा नाम ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी। जैसे तैसे कुछ पीरियड्स ख़तम हुए और ब्रेक टाइम आया। मुझे तो ऐसा ही लग रहा था कि पिंजरे से किसी ने आजाद कर दिया हो। भागे भागे अपने दोस्तों के पास पहुंचा। उन 35 मिनट में पिछले 2 घंटे का लेखा जोखा बयां करना था। घंटी बजने के पांच मिनट पहले ही मैं अपने क्लास में गया था किसी काम से। पूरी क्लास का खाली होना तय ही था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वो लड़की अकेली बैठी हुई थी। आंखो से आंसू बह रहे थे। मुझे देखते ही आंसू पोछने की कोशिश में अपना काजल फैला बैठी थी। पता नहीं उसकी मासूमियत थी, या उसके आंसू पर दिल बहुत ज़ोर से धड़का था। अनजान थी तब भी कदम उसके पास पहुंच ही गया।
” क्या हुआ ” पूछा मैंने।
” कुछ नहीं” आहिस्ते से जवाब दिया उसने।
” पहला दिन हैं ?
” हां ।”
बिल्कुल नाप- तौल कर लग रहा था कि बोलती होगी।
पहला दिन अकेलापन सा महसूस होता ही है, धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। बस यहीं बोल पाया उसे सांत्वना देने के लिए। आखिर उस चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तो अाई।
वैसे अगर दोस्त बनाना चाहती हो तो ये रुमाल लो और अपने फैले हुए काजल को पोछ लो , नहीं तो सब डर जाएंगे। इस पर ज़ोर से हस पड़ी और मेरे हाथ से रुमाल ले लिया।
मैं जब तक नाम पूछ पाता घंटी बज गई और मैं चला गया अपनी सीट पर। जैसे तैसे नई कक्षा का पहला दिन ख़तम हुआ।
अगले दिन जब स्कूल पहुंचा तो मेरी निगाहें उसे ही ढूंढ़ रही थी और वो वहीं अपनी सीट पर बैठी थी कोने में। नज़रे मिली तो वो भी मुस्कुरा दी। मैं अकेला ही बैठा था कल तो सोचा उसके पास ही जा कर बैठ जाऊं, पर कहीं वो मना ना कर दे। या कुछ गलत ना सोच ले। खैर जो होगा देखा जायेगा, पूछ तो सकता हूं।
” यहां बैठ जाऊं, अगर कोई आपती ना हो आपको?”एक सांस में पूछ डाला।
“हां क्यूं नहीं, मुझे भी बेंच पार्टनर चाहिए ही। ” उसने बोला।
और मैं बैठ गया उसके बगल में। आज उतना अजीब भी नहीं लग रहा था क्लास में। एक अनजान में ही कोई अपना दिख रहा था। ब्रेक हुआ तो पूरी क्लास खाली होने लगी, मैं भी निकलने लगा था कि उसने बोला “सुनो आपका रुमाल कल रह गया था मेरे पास! ”
मैं रुमाल ले कर जैसे आगे बढ़ा, मैंने देखा वो वहीं जा कर बैठ गई।
” आप नीचे नहीं चलोगे?”
” नहीं, मेरा मन नहीं है!” साफ साफ दिख रहा था कि मोहतरमा झूठ बोल रही थी।
” अरे चलो, अपने दोस्तों से मिलवाता हूं।” यह बोलते हुए मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
वो तैयार भी हो गई आने के लिए। सीढ़ियां उतरते उतरते मैंने कहा कल से बात कर रहे कम से कम अपना नाम तो बता दो।
नमिता और आपका ?
अभय मैंने कहा।
नाम ही पूछ पाए थे कि हम कैंटीन तक पहुंच गए।
वहां उसे मिलाया अपने पुराने दोस्तो से। सब एक दूसरे से मिल ही पाए थे कि घंटी बज गई और लौटना पड़ा क्लास में। लौटते वक़्त उसके चेहरे पर एक अच्छी मुस्कान थी। उसको खुश देख कर पता नहीं पर मुझे भी बहुत खुशी हुई।
वक़्त बीतता गया और हमारी दोस्ती गहरी हो गई। अब हम दोनों हमेशा साथ रहते थे। ब्रेक में भी सब दोस्तो के रहते भी हम अपनी ही बातें किया करते थे। मेरे पुराने दोस्त कभी कभी चिड़चिड़ा भी जाते थे इस बात पर। लेकिन उस में कुछ बात ही ऐसी थी। मैं चाहता भी था तो भी मुंह नहीं मोड़ पाता था। अब फोन पर भी घंटो बातें करने लगे थे। कभी कभी रात से सुबह हो जाती थी और हमारी बातें लगता था पूरी नहीं होती थी। एक अच्छी दोस्त बन गई वो मेरी। सब कुछ बताते थे । मुझे वैसे बहुत बार लगता था वो कुछ रहस्यमयी सी है लेकिन फिर कभी कुछ कहता नहीं।
एकतरफा उससे मोहब्बत हो गई थी मुझे उससे। दो साल तक बस वो ही मेरे लिए महत्वपूर्ण रही। स्कूल ख़तम होने का ज़्यादा दुःख इसलिए था की अब रोज़ मिलना नहीं होगा। बातें भी कम हो गई। वो दूसरे शहर चली गई। फोन पर बात अब कम होती थी । अलग अलग कॉलेज, व्यस्त जीवन और पढ़ाई का प्रेशर। लेकिन मेरे ज़ेहन से उसका खयाल कभी निकलता नहीं था। दूरी ने मुझे पूरी तरह यकीन दिलवा दिया था कि मुझे मोहब्बत है उससे।
मेरे भी नए दोस्त बन गए थे लेकिन उसकी अपनी जगह थी।

14 फरवरी को आधा शहर गुलाब के फूल से सजा था। सोचा आज मैं भी अपने दिल की बात बोल दूं। बहुत हिम्मत कर के शाम को 7 बजे फोन लगाया। फोन बीजी बताया। एक घंटे तक बेसब्री सा इंतजार करता रहा। फिर उसका फोन आया। हाल चाल पूछने के बाद सोचा अब बोल ही देता हूं। दोस्ती को हमेशा से खोने का डर तो था लेकिन पहली बार बात भी तो रिस्क उठा कर किया था। तो आज भी रिस्क ही सही।

भले वो सामने नहीं थी, तब भी आंख बंद कर के एक सांस में बोल डाला अपने मन की बात। उधर से कोई आवाज़ नहीं आई।
“कुछ तो कहो।” मैंने बोला।
मैं जब से बंगलौर आई हूं तब से रिलेशनशिप में हूं!”
मुझे तो मानो झटका लग गया। मैं कुछ बोल ही नहीं पा रहा था। गले से मानो किसी ने आवाज़ छीन ली हो।
मुबारक हो! बाद में बात करता हूं। यह बोल कर फोन रख दिया मैंने।
अब आगे कुछ बोलने लायक बचा नहीं था।
“मां थोड़ी देर में आता हूं ” बोलते हुए घर से निकल गया।
पीछे से मां की आवाज़ आ रही थी इतनी रात को कहा जा रहा, जैकेट पहनता जा, इतना भी क्या ज़रूरी कल चले जाना , ठंड बहुत है। अरे पैदल क्यूं जा रहा। गाड़ी की चाबी यहीं है। लेकिन फिर भी मुड़ कर देखने की हिम्मत नहीं हो पाई। आंखे पढ़ लेती है मां।
कहा जाना था, क्यूं जाना है? कुछ पता नहीं था बस जाना था।
चलते चलते एक खाली सड़क पर रुक गया। खूब ज़ोर ज़ोर से रोया। चिल्ला चिल्ला कर। ना जाने कितने जन्म का दुख समाया हो। फोन निकाल कर हमारी तस्वीर को देख रहा था। उसकी बातें पहली बार कानों को चुभ सी गई थी। आवाज़ खटक सी रही थी उसकी। दस बज गया था, मां बार बार कॉल कर रही थीं। उठाता तो समझ जाती कि रो रहा हूं। भाई को मेसेज कर दिया कि मां को बोल दो आज निखिल के घर ही रुकूंगा। चिंता ना करे, और सो जाए।

सोचा एक बार और नमिता को फोन करू। उसने एक सेकंड में फोन उठा लिया।
खुश हो आप? इतना ही बोला था कि आंखो से आंसू निकल पड़े।
वो पता नहीं अपने प्यार में इतना खो गई थी कि उसको आज अपने दोस्त का दुख का एहसास ही नहीं हो रहा था।
वो खुशी खुशी अपने प्यार की कहानी सुनाने लगी। कैसे वो मिले, कैसे उसने प्रपोज किया, कैसे इकरार हुआ।
आज मानो उसके शब्द कांटो जैसे चुभ रहे थे।
एक घंटे में मैंने शायद पचास शब्द भी नहीं बोला।
चलो रखता हूं! हिम्मत नहीं हो रही थी आज सुनने की।
रखते रखते उसने इतना ही बोला “सुनो, इतना मत सोचो आपको बहुत अच्छी लड़की मिलेगी। मेरे से भी ज़्यादा।”
मैंने बिना बोले कुछ काट दिया। उसके बाद आज सात साल हो गए मैंने कभी उसे दुबारा फोन नहीं किया। उसने भी नहीं किया। वो रात शायद जी भर रो लिया था मैंने। सात साल में कोई लड़की पसंद नहीं आई। भगवान से एक शिकायत थी कि जब हमें मिलवाना नहीं था, तो हमारी मुलाकात क्यूं करवाई? क्यूं मुझे इतना पागल बना दिया उसके प्यार में?क्यूं
उसकी मासूमियत से पिघलवा दिया था मुझे? क्यूं जीवन के सफर में मुझे आपसे टकरा दिया था? और क्यूं ऐसा बेचैन कर दिया कि घुटन सी हो गई है जीवन को जीना ?
आज मां ने फिर एक नई लड़की की तस्वीर दिखाई थी। तारीफ करते नहीं थक रही थी पर मैं यही सोच रहा था कि क्या आज भी आपका उस लड़के के साथ रिश्ता जुड़ा हुआ है? अगर है तो खुश रहिए, और नहीं हो आज भी यह पागल अभय आपका इंतज़ार कर रहा है।

– निधि ❤ (28-12-2018) (7:52pm)

अभय की डायरी से….

Standard

दिनांक : 4/10/2018

तुम याद तो बहुत आती हो, कभी कभी तो इतना की भरी महफ़िल में भी आँसू छुपाना मुश्किल हो जाता है। कितने हसीन थे वो दिन जब हम साथ हुआ करते थे। लोग अभय-श्रुति के प्यार का उदाहरण दिया करते थे पर तुम चली गई मुझे छोड़ कर या यूँ कहूँ मैंने खो दिया तुम्हें । कितने खूबसूरत थे वो दिन जब हम साथ बैठकर घंटों यूं ही फिजूल बातें करते पर तब भी मन नहीं भरता था। दिल करता था वक़्त थम जाए और हम यही के हो कर रह जाएं। लेकिन सच्चाई को आज तक कौन झुठला पाया था। सच तो यह है कि तुम चली गई , मुझे छोड़ कर अकेला।

हां बेवफा तो मैं ही था जिसने तुझे धोखा दिया था। तुम पर शक करना किसी धोखे से कम था क्या ? तुम कितना समझाती रही , रोती बिलखती हमेशा यकीन दिलाने की कोशिश में रहती थी कि तुम्हारे लिए वो बचपन के दोस्त बहुत मायने रखते है , लेकिन मैं समझा नहीं । हर लड़के के साथ तुम्हारा रिश्ता जोड़ दिया और इस खातिर तुमने अपने दोस्तों को खो दिया । मेरे लिए तुमने आधों से रिश्ता तोड़ दिया। लेकिन भूल गया था मैं की तुम भी तो इंसान हो। एक दिन तुम्हारे सब्र का बांध टूट गया और तुमने एक झटके में रिश्ता तोड़ दिया। उस दिन शायद तुम पूरे मन से आई थी मुझसे आजाद होने के लिए। तुम्हारे पास मेरे क्यूं का जवाब तो नहीं था पर तुम्हे अब अलग होना था। कितनी ज़बरदस्ती करता ? तुम्हारा हाथ पकड़ने कोशिश की तो तुमने एक झटके में हाथ छुड़ा लिया था और चिल्ला उठी बीच सड़क पर – “एक बार में समझ नहीं आता, मुझे नहीं रहना तुम्हारे साथ। आज के बाद मिलने का या बात करने का कोशिश भी मत करना।”
ये बोलते हुए तुम्हारा पूरा शरीर कांप रहा था। आंखो से आंसू बह रहे थे । पर तब भी तुम अलग होना ही मंजूर था। उस दिन तुम्हें लोगों की भी परवाह नहीं थी। कितने लोग उस मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों से उतर चढ़ रहे थे। सब हमें ही देख रहे थे। कुछ तो रुक ही गए थे तमाशा देखने। जो लड़की आज तक बाहर लड़ी नहीं किसी से वो आज इतना चिल्ला रही थी कि आसपास खड़े लोगो को भी नहीं छोड़ा। सब चलते बने और तुम भी तेज़ रफ्तार में चली गई सामने वाली मेट्रो पकड़ने। और मैं वहीं खड़ा तुम्हें एकटक निहारता रहा। उसके बाद से तुम्हें एक बार ही फोन भी किया था पर तुमने काट दिया और एक ही हफ्ते में नंबर भी बदल लिया। अब हमारे बीच कुछ नहीं बचा था। मिलने की भी कोई उम्मीद नहीं थी। अपनी हरकतों पे पछतावा तो बहुत हो रहा था लेकिन तुम्हारी इस आदत से बहुत खूब से वाकिफ था कि तुम रिश्ता तोड़ने में भरोसा नहीं रखती । देखा था कैसे तुम हर रिश्ता को बचाने के कोशिश में लगी रहती थी पर जब एक बार तोड़ देती थी तो दुबारा कभी मुड़कर नहीं देखती फिर चाहे वो इंसान कितना भी शर्मिंदा क्यूं ना हो अपनी किए पर।

खैर तुम चली गई ! मान लिया इस बात को । एक ही शहर में रहते हुए तुम कभी दिखी तक नहीं । तुमने घर भी बदल लिया था अपना और दिल्ली शहर इतना छोटा कहां की कोई खोए हुए को ढूंढ पाए । मैंने भी कोशिश छोड़ दी। लेकिन एक बात कहूं तुम्हारे जाने के बाद एहसास हुआ की हमारे रिश्ते को गलतफहमी ने निगल लिया। तुम काम में बहुत व्यस्त रहती थी पर मुझे लगता था कि वो बहाना था तुम्हारा । तुम्हारा काम से फुर्सत मिलते ही फोन व्यस्त बताता तो मेरा गुस्सा हावी हो जाता था और क्या कुछ नहीं बोल जाता था तुम्हें। तुम भी कहां चुप रहती थी। सुप्रीम कोर्ट की वकील जैसे हर एक तर्क का जवाब देती। हारती नहीं थी बहस करने से। फिर चाहे वो बहस हफ्ते तक ही क्यूं ना चलती रहे। तुम्हारी आदत थी गलत को आइना दिखाने का।

रिश्ता हम दोनों की वजह से ख़तम हुआ। तुम्हारे एक अजीज़ दोस्त से पता चला कि तुम हमारे अलग होने का कारण किस्मत पर मढ़ देती हो। ना खुद को गलत बताती और ना मुझे गलत कहती । हमारे रिश्ते में प्यार तो बहुत था लेकिन फिर भी अलग हो गए। तुम्हारे जाने के बाद से मैं बहुत बदल गया। शराब से भी दोस्ती कर ली थी। लेकिन फिर तुम्हारी कही बात याद आई कि इंसान जीते ही है लोग के मरने के बाद । खुद को बर्बाद कर के तुम सज़ा अपने मां बाप को दोगे । वो तुम्हें ऐसे देख कर खुद में कमी खोजेंगे । ये सब सोच कर शराब को भी ठुकरा दिया। फिर दुबारा हाथ नहीं लगाया। तुमसे दूर था लेकिन तुम्हारी खबर हमेशा रखता था। पता चला तुम मूव ऑन कर गई हो हमारे रिश्ते से। तुम्हें अब किसी बात का ग़म नहीं और मुझसे प्यार भी नहीं करती अब। ये सुन कर तकलीफ हुई। अलग होना कष्टकारी था लेकिन ये सुन कर मानो टूट ही गया । तुम्हारे दिल से प्यार ख़तम हो गया । लेकिन अब पूछता कैसे ?
तुम्हारे जाने के बाद कितनी रात मैंने भी रो कर गुजारी थी। सब से रिश्ता तोड़ दिया था। बस तुम्हे याद करता। कनॉट प्लेस की गलियों मानो चीख रही हो । वो चाय की टपरी
याद हैं ? वो रामू आज भी देख कर मुस्कुरा देता है और पूछता है दीदी नहीं आई ? मैं भी क्या बोलूं हर बार कह देता हूं वो शहर के बाहर गई है। लेकिन वो भी अब समझ गया था कि अब दीदी कभी नहीं आएगी। अब बस मुस्कुरा कर चाय थमा देता और तुम्हारे बारे में पूछता तक नहीं। वो तिलक नगर मेट्रो स्टेशन के नीचे छोले कुलचे वाले के पास मैं आज भी जाता हूं पर अब ज़्यादा मिर्ची वाले छोले खाने लगा हूं। तुम्हे पसंद थी मिर्च इसलिए अब मैं भी खाने लगा हूं। भैया कहता भी है कि बेटा फीका बना दूं। तुम्हारी आंखो से पानी आ रहा। पर उन्हें क्या पता कि यह मिर्ची की वजह से नहीं, तुम्हारी याद में आ रहे।

दिल करता की एक बार जीवन में तुम मिल जाओ तो अपना दिल खोल कर रख दूं तुम्हारे आगे। भगवान भी इतने निष्नठुर हीं। मेरी आखिर सुन ही ली। पांच साल बाद तुम एक दिन मिल गई। तुम थम सी गई मुझे देख कर। पर मुझे ना जाने क्या हो गया। मैं चिल्ला उठा तुम पर। पिछली बार तुम्हे लोगों का फ़िक्र नहीं थी, इस बार मुझे नहीं रही। तुम मुझे देख कर सहम गई थी। लेकिन मुझे जानना ही था कि तुमने मुझे क्यूं छोड़ दिया था। इस बार कुछ अलग था लेकिन तुम चिल्लाई नहीं एक बार भी, थोड़ा सा भी गुस्सा नहीं दिख रहा था तुम्हारी आंखो में और ना ही मुझे ग़म दिखा ।
” मुझे तुझसे अब डर लगने लगा था। तुम कभी भी हंगामा करने की जो धमकी देने लगते थे ना इससे मुझे घुटन होने लगी था। आज हम पांच साल बाद मिले, लेकिन तुम फिर चिल्ला उठे। बस यही वजह थी कि तुम्हे छोड़ना बेहतर समझा। शादी के बाद तलाक से तो बेहतर ही था कि अब ही अलग हो गए। “ एक सांस में तुमने सब बोल डाला।
“मैं बदल भी तो सकता था, तुम मुझे सुधार भी तो सकती थी। “
” बहुत कोशिश की थी मैंने। मुझे भी उतनी ही तकलीफ हुई थी, पर जिस दिन एहसास हुआ कि प्यार से ज़्यादा हावी डर का हो गया हमारे रिश्ते में, मैंने तोड़ना ही बेहतर समझा। ” तुम बोली और इस बार तुम्हारी आंखो में भी आंसू था
लेकिन तुमने बहने नहीं दिया अपने आंसुओ को और बोली , “चलती हूं बहुत देर हो रही। खुश रहो हमेशा। और हां मैंने मूव ऑन कर लिया है, बेहतर है तुम भी कर लो।”

मैं एकटक तुम्हें निहारता रहा था और तुम सामने वाली मेट्रो में चढ़ कर निकल गई।

पिछली बार जब तुम गई थी तो बहुत कुछ उलझा रहा , इस बार गई तो ऐसा लगा सब सुलझा गई लेकिन मैंने एक बदली हुई श्रुति को इस बार देखा। हमेशा चंचल सी उड़ती लड़की एकदम शांत हो गई। गलत सुनना भी जो पसंद नहीं करती थी आज गलत बातों को सहने लग गई। हर किसी से दौड़ में आगे निकलने के बजाय अब वो भीड़ के साथ चलना पसंद करने लगी थी। बड़े बड़े ख्वाबों को देखने वाली मेरी श्रुति अब हर हालत को स्वीकारने के लिए तैयार थी।
बहुत बदल गई थी तुम। सच ही कहते थे लोग की प्यार इंसान को बदल देता है।

पांच साल हो गए अलग हुए पर लगता है जैसे कल ही सब बात थी। गलती भी किसी की नहीं थी , प्यार भी बहुत था पर किस्मत में नहीं था हमारा साथ और बिछड़ गए हम दोनों हमेशा के लिए, प्यार को कहीं बहुत अंदर दफना कर चल दिए अपने अपने रास्ते।

दिल की छोटी-छोटी ख़्वाहिशें

Standard

कभी कभी दिल चाहता हैं भाग जाऊं! हाँ, भाग जाऊं सब चीज़ों से ,मन की शांति के लिए। संभाले नहीं संभल रही कुछ चीज़ें और पूरी नहीं कर पा रही हूँ अपनो की अपेक्षाएं। वो सोलह साल की लड़की जिसने न जाने कितने ख़्वाब बुने थे, ख़ुद को कहाँ पहुँचाने का सोचा था और आज जीवन उस मोड़ पर आ गया की बस यूँ ही दिन काट रही, बिन मंज़िल के चली जा रही हूँ , सफ़र खत्म ही नहीं हो रहा और न कोई नया रास्ता मिल रहा है । समझ नहीं आ रहा कि खुद को समझाया जाए या लोगों को कि उम्मीद कम रखें। दिल तो अब भी एक बच्चे की तरह खिलखिला उठता है हर छोटी खुशी में पर जब रोने की बारी आती है तो दुनिया से छुपने को एक कोना ढूंढता है। तब एहसास होता है कि कितने बड़े हो गए कि गम छुपाना पड़ रहा है और छुपा क्यूं रहें है इससे खुद भी अक्सर बेखबर ही रहते। कई बार तो यह हाल होता है कि ग़म किस बात का है इसका भी पता नहीं होता। बस ना कुछ अच्छा लगता है, ना किसी से बात करने का मन करता है। अकेलापन भाता है दिल को, सुकून का एहसास उस में ही होता है।

बहुत ज़्यादा दिखावा कर के जीना पड़ता है अब तो। पहले जिन अदाओं पर हमारे हंस दिया करते थे , मासूमियत झलकती थी , आज उन्हीं हरकतों पर लोग बातें सुनाने लगे है। “उम्र का लिहाज ही नहीं,कितनी बचकानी हरकत है” जैसी बातें सुनने को मिलती हैं, और तब लगता है कि अब तो जीना भी अपने हिसाब से मुमकिन ना रहा। जब बच्चे थे तो बड़े होने की बहुत दिली तमन्ना थी। सच कहूं तो अब वो बचपन के दिन ही ठीक लगते थे। काश वक़्त लौट पाता और हम वो दिन फिर से जी पाते!

बचपन में कोई पसंद होता था तो कितना आसान होता था यह कहना की आप बहुत अच्छे हैं, आप मेरे फेवरेट हैं। अब वक़्त के साथ यह सब कहना भी मुश्किल हो गया है। जिसको कहना है वो कहीं कुछ गलत ना सोच ले यह सोच कर अपने सर में दर्द करवा लेते है और कह भी नहीं पाते। बचपन में किसी को रोता देख कर तुरंत पहुंच जाया करते थे उसको चुप कराने। दिल अब भी उतना ही बेताब होता है जब किसी को रोता देखते है पर अब जा कर चुप नहीं करा पाते।असहाय सा खड़ा हो कर एक टक बस निहारते हैं। हर दिल में एक तकलीफ है जिसका आभास सामने वाले को होता है पर अब पूछने से डर लगता है। इसलिए तमाशा देखते रहते हैं।

सुनो ना ! अभी भी कभी-कभी ट्रेन से जाते वक़्त रोड पर खड़े लोगों को बाय-बाय करने का जी चाहता है लेकिन हाथ बढ़ा कर भी पीछे कर लेते है। अपनी खुशी से बढ़ कर चिंता होती है साथ की सीटों पर बैठे लोगों कि कि वो क्या सोचेंगे ? पता नहीं आपको करता है कि नहीं पर मुझे तो अभी भी जब वो हवाई जहाज मेरे घर के ऊपर गुज़रता है तो दौड़ कर बाहर जाने का मन करता है लेकिन कदम पीछे करने पड़ते है। अभी भी आइसक्रीम और गुब्बारे उतने ही आकर्षित करते है जितने तब किया करते थे जब पापा खुशी-खुशी वो सब ला दिया करते थे। पर अब न मांग पाते हैं और खुद खरीदने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। कौन सुने वो तानों की बौछार ?

बचपन में कोई पूछता था कि क्या बनना है तो बिना सोचे फटाफट बोल देते थे कभी कि डॉक्टर बनना है, कभी टीचर , कभी पायलट , कभी कुछ ओ कभीकुछ ! बड़े बड़े ख्वाब बचपन से ही देखे थे। आज वो ही सवाल जब कोई पूछता है तो जवाब ही नहीं होता। होता भी है तो हिकिचाते हैं। चुप रहना बेहतर समझते है। कहीं न बन पाए तो ? लोग मज़ाक उड़ाएंगे !

कोई सच में अगर जानना चाहता है कि मुझे क्या करना है तो सुने मुझे ना अपने चौबीस घंटे में कुछ आठ घंटे वो अनाथ आश्रम के बच्चो के साथ बिताना है और बाकी कुछ छह घंटे वृद्धाश्रम के लोगों के साथ। उनके लिए ही कुछ करना चाहती थी हमेशा से। करना तो आज भी चाहती हूं लेकिन अब दिल में रखना पड़ता है इस ख़्वाब को क्योंकि खुद ही उस लायक नहीं बन पाई , पता नहीं आगे भी बन पाऊं या नहीं।

कभी कभी लगता है उम्र से ज़्यादा बड़े हो गए हैं। बहुत कुछ ज़िन्दगी ने अभी ही सीखा दिया। बहुत कुछ सुनाना चाहते है लेकिन आज के भाग दौड़ में किसको इतनी फुर्सत कि बैठ कर सुने । अपने ही उलझनों को सुलझाने में सारा वक़्त ज़ाया हो रहा।

खैर! यह सब आज लिखा क्योंकि आज एहसास हो रहा था ताजी हवा में बैठ कर भी दम घुट रहा है। खुले आसमान के नीचे भी कितना अंधेरा है। सब अपनों के बीच बैठ कर भी कितना अकेलापन है। ज़िंदा तो सब हैं पर जी कोई भी नहीं रहा। दिखावे की दुनिया में असलियत ने दम तोड़ दिया है। और सब ही एक झूठी मुस्कान के साथ ज़िंदगी बिता रहे हैं ।

– निधि💕

एक और कोशिश।

Standard

यह कैसा न्याय हुआ जनाब, न मेरे सवालों का जवाब दिए और न मेरी तरफ की बात सुनी । अब तो आभास हो ही गया आपको भी शत-प्रतिशत कि वो आप ही हैं। जब याद आ ही गया की जैकेट वाले कोई और नहीं बल्कि आप ही हैं तो अब अनजान बनने का क्या फायदा ? मैंने भी तो क़बूल कर ही लिया लेखक अपने ही दिल की बात लिखते हैं।
“अब मैं समझा” – ऐसे कौन बात खत्म करता है?
क्या समझे यह पूछने का मौका भी नहीं दिए । और तब भी लग रहा कि यह अधूरा कबूलना है मेरा ,तो लीजिए कहते हैं खुले आम कि हाँ जैकेट वाले इंसान और जिस के बारे में मैं अपने लेख में लिखती हूँ वो एक ही हैं और “आप” ही हैं । रही बात इश्क़ कैसे हुआ कब हुआ कम से कम ये सुनाने का मौका तो दे दीजिए मुझे !

एक दफ़ा फिर बोल रही हूँ मेरे चारों लेखों को फिर एक बार पढ़ें , एक साथ पढ़ें। मेरे सारे एहसासों का अंदाजा हो जाएगा आपको । हर एक लेख की हर एक बात आपसे ही जुड़ी है। कितना प्यार अंदर समा रखा है यह जताने का मौका तो दे दीजिए ।

पहले भी कहा था अगर आपको बदनामी का डर सता रहा तो मेरा प्यार इतना कमज़ोर नहीं कि यूँ ही आपको बदनाम कर दूँ । इश्क़ किया है साहब मज़ाक नहीं!

आपकी इज़्ज़त भी उतनी ही प्यारी हैं जितनी खुद की है । और इश्क़ न भी होता तो भी मुझे प्यार और ज़िद के बीच का फर्क बहुत अच्छे से पता हैं । ज़िद होती तो इतना संकोच होता ही नहीं आपको सब बताने के लिए। प्यार है इसलिए इतना सोचना पड़ा । मानती हूँ हमारे बीच के रिश्ते की मर्यादा का उल्नलंघन मैंने ही किया लेकिन दिल ही तो है, आ गया आप पर। आपके संयमप्रिय स्वभाव ने आकर्षित कर लिया था और फिर आपकी बातें काफी थी मुझे और बहकाने के लिए।

हिंदी लिखना कितना मुश्किल हैं मेरे लिए यह तो बस मुझे ही पता है लेकिन फिर भी लिखती हूँ क्योंकि आपने कहा था हिंदी में बातें ज़्यादा अच्छे से व्यक्त होती हैं। क्या मेरे एहसासों को आप तक पहुँचने के लिए कोई भी भाषा काम नहीं करेगी? सोच भी नहीं सकते हैं आप कि कितनी तकलीफ़ हो रही है मुझे। विचलित है मन आपसे इतना कुछ पूछने के लिए पर आप पता नहीं क्यों ऐसा बर्ताव कर रहे । वैसे तो यह बात कई बार पहले भी कहा है पर फिर कह रही हूँ कि जितनी इज़्ज़त आपकी हां की है, उतनी ही इज़्ज़त आपके न की भी। ज़बरदस्ती प्यार नहीं किया जाता है, न कराया जाता है। आप मुझे पसंद हैं पर मैं भी आपको पसंद ही आऊँ ये तो ज़रूरी नहीं। और इसके लिए मैं आपको बदनाम कर दूंगी तो ये तो बहुत ही गलत सोचते हैं आप। खैर ! और लिखने का अब फायदा नहीं रहा जब पहले इतना कुछ लिखा फिर भी आपने अनदेखा करना बेहतर समझा ।

प्यार का रिश्ता नहीं पर दोस्ती का एक खूबसूरत रिश्ता साझा कर ही सकते हैं हम। कम से कम मुझे आपको पूरी तरह जानने का मौका तो मिलेगा।

सुनिए !! आज के बाद लिखना छोड़ देंगे अपने एकतर्फे प्यार के बारे में अगर इस बार भी अनदेखा करने का सोचा है आपने तो। मानती हूँ बेइंतहा इश्क है आपसे और शायद रहेगा भी पर मेरे आत्मसम्मान का समझौता भी मंजूर नहीं मुझे । इश्क़ ही किया है कोई गुनाह नहीं की आप हर बार यूँ अनदेखा कर देंगे मुझे और मैं ऐसे ही लिखती रहा करुँगी । अनदेखा कर के आप मेरे प्यार का अपमान कर रहे हैं जो शायद मुझसे सहा नहीं जा रहा । आपसे इश्क़ कर के थोड़ा बहुत संयम रखना मैंने भी सीखा हैं इसलिए एक साल से एकतर्फे लिखती जा रही । पर शायद अब न कुछ लिखने लायक बचा और न ही शायद कुछ कहने के लिए। पूरा दिल निकाल दिया है मैंने ।

कल जब आपने यूं बात अधूरी छोड़ दी तो मुझे कुमार विश्वास की एक लाइन याद आ गई,

“अभी तक डूबकर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का,
मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हंगामा ।”

एक ही रात में पहली बार लिखा है ताकि सुबह-सुबह भेज पाऊं। इंतज़ार रहेगा आपके जवाब का, पिछले लेख की तरह यूँ न बोलिएगा कि “सोच रहा था क्या जवाब दूँ” । मेरे ही पक्ष में हो यह तो मैं बिलकुल नहीं चाहती। लेकिन जवाब मिले इसकी बहुत दिली तमन्ना हैं । वैसे पता नहीं आप जवाब देंगे या नहीं पर यकीं है मुझे भी की जब जब आप उस हाफ ग्रे जैकेट को पहनेंगे मुझे याद कर आपके चेहरे पे एक मुस्कान ज़रूर आएगी ।

कुछ भी जो आपको सही लगे कह दीजिए, और मुझे भी दिल खोल कर पूछ लेने दीजिए ,कह लेने दीजिए।

– निधि

एक और ख़त आपके नाम ।

Standard

जब जब ये कलम उठाई है लिखने के लिए बस आप का ही ख़्याल ज़ेहन में आया हैं और फिर लिख डाले कई दफ़े और अब आप के नाम का एक और लेख। इतना गहरा लगाव भी हो सकता है किसी इंसान से वो भी एक तरफ़ा यह तो अब जा कर ही पता चला । प्यार में पागल लोगों को देख कर हर बार यही ख्याल आता है की क्या सच में प्यार इतना खूबसूरत हैं की वो दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ बन सकती हैं ? वो सही ही कहते हैं जब कोई चीज़ खुद पर बीतती है तब जा कर एहसास होता है उस भावना का, दर्द का, तड़पन का । प्यार पर मुझे भी पूरा भरोसा ही रहा हैं लेकिन दो लोगों के बीच के प्यार को देख कर हर बार चाह करती थी इस एहसास को अनुभव करने की । पर ज़िन्दगी अपने ढंग से खेल गयी मेरे साथ। प्यार तो हुआ मुझे भी या यूँ कहूँ बेइंतहा इश्क ही हो गया आपसे। पर ताज़्जुब की बात तो यह है जब मोहब्बत ने दस्तक दी मेरे जीवन में तो वो एक तर्फे रूप में और शायद हमेशा एक तरफ़ा ही रहेगा।

जब भी कोई पूछता है कैसा लड़का पसंद है तुम्हें ,तो आँखो के सामने सिर्फ आपका ही चेहरा आता है और लबों पर आपका ही नाम। वजह खुद को तो पता है लेकिन दूसरों को कैसे बताऊँ, अपने एहसास कैसे जताऊं किसी और के सामने। यह सब तो खुद में समेट रखा है सिर्फ आपको बतलाने के लिए।

एक तर्फा प्यार इंसान को तबाह कर देता है या यूँ कहूँ इंसान खुद तबाह होना पसंद करता हैं । सच मुझे खुली आँखों से दिख रहा पर फिर भी पता नहीं क्यों एक झूठी आस ले कर दिल में बैठी हूं‌। एकदम अनजान हूँ मैं इस बात की क्या आप को किसी से प्यार से ?क्या आपके जीवन में कोई पहले से हैं ? क्या आपको भी मेरी तरह किसी और से एक तरफ़ा ही सही इश्क़ है या फिर क्या आपने अपने जीवन में पहले ही किसी और को अपना चुके हो ? या आपको इंतज़ार है किसी का या फिर यूँ कहूँ की अपना दिल हार बैठे हैं किसी और के लिए ? इतने सवाल है मन में, जितनी दफा आपसे बात होती हैं सोचती हूँ पूछ ही लेती हूँ और शांत कर लेती हूँ खुद के मन को। लेकिन फिर डर कर अपने कदम पीछे कर लेती हूँ, काबू पा लेती हूँ खुद के मन पर ये सोच कर कि अधिकार क्या है मेरा आप पर जो इतना कुछ पूछ लूँ । पर एक बात सच कहूं पता नहीं आप के प्रेम जीवन में क्या चल रहा है पर मेरे जीवन में आप मेरे ही हो । मन से स्वीकार कर रखा है आपको। मेरे दिल में बस आपकी ही तस्वीर समायी है ।अक्सर आपके तस्वीर से बातें कर दिल को बहला लेती हूँ।
भले दो तर्फे प्यार का रिश्ता न हो हमारे बीच पर तब भी मेरे सामने जब भी प्रेम की चर्चा होती हैं तो आपका ही ख्याल आता हैं। कभी कभी लगता है की खुद को जानबूझ कर ही चोट पंहुचा रहे।आपसे जवाब तो तब मिलेगा जब आपके सामने अपने हाल-ऐ-दिल बयां करने का हौसला रख पाऊँगी। वैसे हैं तो आप बहुत ही संयमप्रिय इंसान पर ऐसा प्रतीत होता है की कभी मैंने अपना इश्क़ कबूल लिया और आप अपना धैर्य खो बैठे। अगर पूरा यक़ीन नहीं पर शक तो आपको पक्का ही है मुझ पर। इतना खुले आम इश्क़ कबूलती हूँ मैं पर आपने शायद पूरा मन बना लिया है मुझे तकलीफ पहुँचाने का या यूँ बोलूँ कि अच्छा लगता है आपको मुझे ऐसे कतरा कतरा टूटते देख । दो साल से बस इधर उधर भटकती सी हो गई है ज़िन्दगी। पता हैं आप नहीं मिलेंगे, कभी मेरे नहीं होंगे फिर भी दिल तो आपके नाम पर ही धड़कता है

वैसे तो एक साल से ज़्यादा हो गया आपको देखे पर अब भी यकीन है कि आप सामने आएंगे तो दिल की धड़कन वैसे ही तेज़ होगी, नज़रे यूँ ही झुकेंगी, लब पर वो हल्की सी मुस्कान फिर खिलेगी जैसे पहली दफा हुआ था जब एहसास हुआ था कि आपसे इश्क़ कर बैठी हूँ मैं । थोड़ी बावली सी हूँ मैं और पता नहीं क्यों आज के मॉडर्न ज़माने के हिसाब से खुद को पूरी तरह ढाल नहीं पाई हूँ । सुनिए न , नब्बे दशक के गाने को सुनने में ही आधा दिन बीत जाता है पर सच कहूँ जो गाना आपने गाया था न अब उस गाने से ही मेरी रात और सुबह होती । आज भी दिल मचल उठता है आपको एक नज़र देखने के लिए। चाहे आपके घर की गली हो या आपके ऑफिस की गली , अपने पलक को झपकने नहीं देती इस उम्मीद में कि कहीं आप दिख जाए। पर ऐसा लगता है जैसे मेरे भगवान को भी मज़ा आता है मुझे यूँ तड़पता देख। इसलिए ही तो न जाने उन गलियों से गुजरने के बावजूद आप की एक झलक न दिखी कभी । दिल मचलता है आपको उस वाइट शर्ट में देखने के लिए पर ठण्ड के दिनों में जब आप उस ब्लैक या ब्लू कोट में, या अपने उस ब्लैक जैकेट में मेरे सामने आते है तो आपको बस एक टक निहारने का जी चाहता है।

और रही आप आपकी उस हाफ ग्रे जैकेट की तो ऐसा लगता है जितना प्यार आपसे हैं मुझे उतना ही उस जैकेट से हो गया है। वो 21 जनवरी की सुबह की यादें आज भी ज़हन मे ताज़ी ही है। एक रात पहले मैंने आपकी उस जैकेट की तारीफ की और अगले दिन आप पहन आये। उस दिन तो दिल पर काबू पाना मुश्किल हो गया था । अभी भी इंतज़ार हैं की आप उस जैकेट में फोटो डाले और मैं उसको दिन रात निहार पाऊँ बस ।

इतनी दफा लिख लिया आपको एहसास कराने की कोशिश में या कहूं नाकामयाब कोशिश। एक एक शब्द चीखता है मेरे हर लेख का इस उम्मीद में कि कभी तो आप समझ लेंगे लेकिन फिर हर कर थक कर बैठ जाती हूँ।

आज दुबारा लिखने का इसलिए सोचा क्यूंकि आज जन्मदिन हैं मेरा और आप इतने निष्ठुर तो नहीं होंगे की आज भी मौका न दे मुझे अपने दिल का हाल बताने का या सुनिये न आज फैसला कर ही दीजिये ये बता कर कि हाँ आपको पता तो है की वो आप ही हैं लेकिन आप अपना नहीं सकते मुझे।

सच कह रही हूँ कोई शिकायत नहीं होगा मुझे आपसे। एक शब्द नहीं कहूँगी आपको बस संतुष्ट हो जायूँगी अपने सवालों का जवाब पा कर । पर अगर आपने आज फिर खुद जवाब नहीं दिया तो आज मैं भी कुछ नहीं कहूँगी, जन्मदिन की यादें बहुत खास होती हैं इसलिए यादें अच्छी हो तो ही बेहतर है।

पर आपके जन्मदिन पर ज़रूर इस बार सब कह जाउंगी भले उसका परिणाम जो हो। सितम्बर से फरबरी तक का सफर पांच महीने का ही है जब दो साल सब्र कर लिया तो और पांच महीने और सही।आखिर में यही कुछ झूठी ही सही बस एक उम्मीद जिंदा हैं दिल में कि आज आप मुझे बोलने का मौका ज़रूर देंगे।एक पहल कर दीजिये बाकी अपना हाल-ए-दिल मैं खुद बयां कर जाउंगी।

– निधि