अभय की डायरी से….

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दिनांक : 4/10/2018

तुम याद तो बहुत आती हो, कभी कभी तो इतना की भरी महफ़िल में भी आँसू छुपाना मुश्किल हो जाता है। कितने हसीन थे वो दिन जब हम साथ हुआ करते थे। लोग अभय-श्रुति के प्यार का उदाहरण दिया करते थे पर तुम चली गई मुझे छोड़ कर या यूँ कहूँ मैंने खो दिया तुम्हें । कितने खूबसूरत थे वो दिन जब हम साथ बैठकर घंटों यूं ही फिजूल बातें करते पर तब भी मन नहीं भरता था। दिल करता था वक़्त थम जाए और हम यही के हो कर रह जाएं। लेकिन सच्चाई को आज तक कौन झुठला पाया था। सच तो यह है कि तुम चली गई , मुझे छोड़ कर अकेला।

हां बेवफा तो मैं ही था जिसने तुझे धोखा दिया था। तुम पर शक करना किसी धोखे से कम था क्या ? तुम कितना समझाती रही , रोती बिलखती हमेशा यकीन दिलाने की कोशिश में रहती थी कि तुम्हारे लिए वो बचपन के दोस्त बहुत मायने रखते है , लेकिन मैं समझा नहीं । हर लड़के के साथ तुम्हारा रिश्ता जोड़ दिया और इस खातिर तुमने अपने दोस्तों को खो दिया । मेरे लिए तुमने आधों से रिश्ता तोड़ दिया। लेकिन भूल गया था मैं की तुम भी तो इंसान हो। एक दिन तुम्हारे सब्र का बांध टूट गया और तुमने एक झटके में रिश्ता तोड़ दिया। उस दिन शायद तुम पूरे मन से आई थी मुझसे आजाद होने के लिए। तुम्हारे पास मेरे क्यूं का जवाब तो नहीं था पर तुम्हे अब अलग होना था। कितनी ज़बरदस्ती करता ? तुम्हारा हाथ पकड़ने कोशिश की तो तुमने एक झटके में हाथ छुड़ा लिया था और चिल्ला उठी बीच सड़क पर – “एक बार में समझ नहीं आता, मुझे नहीं रहना तुम्हारे साथ। आज के बाद मिलने का या बात करने का कोशिश भी मत करना।”
ये बोलते हुए तुम्हारा पूरा शरीर कांप रहा था। आंखो से आंसू बह रहे थे । पर तब भी तुम अलग होना ही मंजूर था। उस दिन तुम्हें लोगों की भी परवाह नहीं थी। कितने लोग उस मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों से उतर चढ़ रहे थे। सब हमें ही देख रहे थे। कुछ तो रुक ही गए थे तमाशा देखने। जो लड़की आज तक बाहर लड़ी नहीं किसी से वो आज इतना चिल्ला रही थी कि आसपास खड़े लोगो को भी नहीं छोड़ा। सब चलते बने और तुम भी तेज़ रफ्तार में चली गई सामने वाली मेट्रो पकड़ने। और मैं वहीं खड़ा तुम्हें एकटक निहारता रहा। उसके बाद से तुम्हें एक बार ही फोन भी किया था पर तुमने काट दिया और एक ही हफ्ते में नंबर भी बदल लिया। अब हमारे बीच कुछ नहीं बचा था। मिलने की भी कोई उम्मीद नहीं थी। अपनी हरकतों पे पछतावा तो बहुत हो रहा था लेकिन तुम्हारी इस आदत से बहुत खूब से वाकिफ था कि तुम रिश्ता तोड़ने में भरोसा नहीं रखती । देखा था कैसे तुम हर रिश्ता को बचाने के कोशिश में लगी रहती थी पर जब एक बार तोड़ देती थी तो दुबारा कभी मुड़कर नहीं देखती फिर चाहे वो इंसान कितना भी शर्मिंदा क्यूं ना हो अपनी किए पर।

खैर तुम चली गई ! मान लिया इस बात को । एक ही शहर में रहते हुए तुम कभी दिखी तक नहीं । तुमने घर भी बदल लिया था अपना और दिल्ली शहर इतना छोटा कहां की कोई खोए हुए को ढूंढ पाए । मैंने भी कोशिश छोड़ दी। लेकिन एक बात कहूं तुम्हारे जाने के बाद एहसास हुआ की हमारे रिश्ते को गलतफहमी ने निगल लिया। तुम काम में बहुत व्यस्त रहती थी पर मुझे लगता था कि वो बहाना था तुम्हारा । तुम्हारा काम से फुर्सत मिलते ही फोन व्यस्त बताता तो मेरा गुस्सा हावी हो जाता था और क्या कुछ नहीं बोल जाता था तुम्हें। तुम भी कहां चुप रहती थी। सुप्रीम कोर्ट की वकील जैसे हर एक तर्क का जवाब देती। हारती नहीं थी बहस करने से। फिर चाहे वो बहस हफ्ते तक ही क्यूं ना चलती रहे। तुम्हारी आदत थी गलत को आइना दिखाने का।

रिश्ता हम दोनों की वजह से ख़तम हुआ। तुम्हारे एक अजीज़ दोस्त से पता चला कि तुम हमारे अलग होने का कारण किस्मत पर मढ़ देती हो। ना खुद को गलत बताती और ना मुझे गलत कहती । हमारे रिश्ते में प्यार तो बहुत था लेकिन फिर भी अलग हो गए। तुम्हारे जाने के बाद से मैं बहुत बदल गया। शराब से भी दोस्ती कर ली थी। लेकिन फिर तुम्हारी कही बात याद आई कि इंसान जीते ही है लोग के मरने के बाद । खुद को बर्बाद कर के तुम सज़ा अपने मां बाप को दोगे । वो तुम्हें ऐसे देख कर खुद में कमी खोजेंगे । ये सब सोच कर शराब को भी ठुकरा दिया। फिर दुबारा हाथ नहीं लगाया। तुमसे दूर था लेकिन तुम्हारी खबर हमेशा रखता था। पता चला तुम मूव ऑन कर गई हो हमारे रिश्ते से। तुम्हें अब किसी बात का ग़म नहीं और मुझसे प्यार भी नहीं करती अब। ये सुन कर तकलीफ हुई। अलग होना कष्टकारी था लेकिन ये सुन कर मानो टूट ही गया । तुम्हारे दिल से प्यार ख़तम हो गया । लेकिन अब पूछता कैसे ?
तुम्हारे जाने के बाद कितनी रात मैंने भी रो कर गुजारी थी। सब से रिश्ता तोड़ दिया था। बस तुम्हे याद करता। कनॉट प्लेस की गलियों मानो चीख रही हो । वो चाय की टपरी
याद हैं ? वो रामू आज भी देख कर मुस्कुरा देता है और पूछता है दीदी नहीं आई ? मैं भी क्या बोलूं हर बार कह देता हूं वो शहर के बाहर गई है। लेकिन वो भी अब समझ गया था कि अब दीदी कभी नहीं आएगी। अब बस मुस्कुरा कर चाय थमा देता और तुम्हारे बारे में पूछता तक नहीं। वो तिलक नगर मेट्रो स्टेशन के नीचे छोले कुलचे वाले के पास मैं आज भी जाता हूं पर अब ज़्यादा मिर्ची वाले छोले खाने लगा हूं। तुम्हे पसंद थी मिर्च इसलिए अब मैं भी खाने लगा हूं। भैया कहता भी है कि बेटा फीका बना दूं। तुम्हारी आंखो से पानी आ रहा। पर उन्हें क्या पता कि यह मिर्ची की वजह से नहीं, तुम्हारी याद में आ रहे।

दिल करता की एक बार जीवन में तुम मिल जाओ तो अपना दिल खोल कर रख दूं तुम्हारे आगे। भगवान भी इतने निष्नठुर हीं। मेरी आखिर सुन ही ली। पांच साल बाद तुम एक दिन मिल गई। तुम थम सी गई मुझे देख कर। पर मुझे ना जाने क्या हो गया। मैं चिल्ला उठा तुम पर। पिछली बार तुम्हे लोगों का फ़िक्र नहीं थी, इस बार मुझे नहीं रही। तुम मुझे देख कर सहम गई थी। लेकिन मुझे जानना ही था कि तुमने मुझे क्यूं छोड़ दिया था। इस बार कुछ अलग था लेकिन तुम चिल्लाई नहीं एक बार भी, थोड़ा सा भी गुस्सा नहीं दिख रहा था तुम्हारी आंखो में और ना ही मुझे ग़म दिखा ।
” मुझे तुझसे अब डर लगने लगा था। तुम कभी भी हंगामा करने की जो धमकी देने लगते थे ना इससे मुझे घुटन होने लगी था। आज हम पांच साल बाद मिले, लेकिन तुम फिर चिल्ला उठे। बस यही वजह थी कि तुम्हे छोड़ना बेहतर समझा। शादी के बाद तलाक से तो बेहतर ही था कि अब ही अलग हो गए। “ एक सांस में तुमने सब बोल डाला।
“मैं बदल भी तो सकता था, तुम मुझे सुधार भी तो सकती थी। “
” बहुत कोशिश की थी मैंने। मुझे भी उतनी ही तकलीफ हुई थी, पर जिस दिन एहसास हुआ कि प्यार से ज़्यादा हावी डर का हो गया हमारे रिश्ते में, मैंने तोड़ना ही बेहतर समझा। ” तुम बोली और इस बार तुम्हारी आंखो में भी आंसू था
लेकिन तुमने बहने नहीं दिया अपने आंसुओ को और बोली , “चलती हूं बहुत देर हो रही। खुश रहो हमेशा। और हां मैंने मूव ऑन कर लिया है, बेहतर है तुम भी कर लो।”

मैं एकटक तुम्हें निहारता रहा था और तुम सामने वाली मेट्रो में चढ़ कर निकल गई।

पिछली बार जब तुम गई थी तो बहुत कुछ उलझा रहा , इस बार गई तो ऐसा लगा सब सुलझा गई लेकिन मैंने एक बदली हुई श्रुति को इस बार देखा। हमेशा चंचल सी उड़ती लड़की एकदम शांत हो गई। गलत सुनना भी जो पसंद नहीं करती थी आज गलत बातों को सहने लग गई। हर किसी से दौड़ में आगे निकलने के बजाय अब वो भीड़ के साथ चलना पसंद करने लगी थी। बड़े बड़े ख्वाबों को देखने वाली मेरी श्रुति अब हर हालत को स्वीकारने के लिए तैयार थी।
बहुत बदल गई थी तुम। सच ही कहते थे लोग की प्यार इंसान को बदल देता है।

पांच साल हो गए अलग हुए पर लगता है जैसे कल ही सब बात थी। गलती भी किसी की नहीं थी , प्यार भी बहुत था पर किस्मत में नहीं था हमारा साथ और बिछड़ गए हम दोनों हमेशा के लिए, प्यार को कहीं बहुत अंदर दफना कर चल दिए अपने अपने रास्ते।

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TABLE FOR ONE

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BLURB :
Taara Maheshwari, a single woman in her thirties and a successful lawyer, is tough from outside but a die heart fan of romantic movies from inside.
She grew up seeking her “happily ever after’ but amid various heartbreaks and culture of modern age short term relationships, her believe in “true connections” got replaced by the comfort of being “emotionally disconnected.”
After she turned 31, her parents persuaded her into meeting a guy for marriage who sounded just perfect for her. Acting on impulse, she told her parents that she would meet him only if they let her go on a trip to Europe.
As Taara went on to explore the world, she experienced what actually happens when a single Indian girl travels to Europe all by herself. Is it only about dancing, singing or falling in love? What happens after you fall in love? Does love conquer all?
Only her story would tell.

MY REVIEW :

‘Table For One’ By Neha Bindal is a book that will remind you of days of the adventures you did in life and will make you regret if you never did any. The title of the book is apt and the cover is designed amazingly. I feel no other cover would have done justice to the novel. The blurb will excite you to turn the pages as soon as possible.
The book holds the story of Taara Maheshwari, the main protagonist of the novel. Taara is all set for her solo trip to Europe. Her parents sent her on the promise that once she is back she will get married. The story takes an exciting turn after this. She was experiencing new things and most importantly she was discovering herself. The book will run various emotions within you. The narrative technique of the author is brilliant. The description of the places done by the author will make you feel like you are travelling with Taara. Overall, the book proved to be an enjoyable read for me.

RATING : 5/5

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2 DAY DOWN

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BLURB :
2-day-down is a compilation of stories of 5 women from different walks of life. Each story digs into one of the five period related problems: Pain/Staining/Sexual Inhibition/PMS/Taboo, through each one’s journey. The title signifies the second day of a woman’s period, which is said to be the toughest of the five days. The stories are a reflection of the less acknowledged society around us. Through menstrual problems as a window, the book is an attempt to bring light to the intriguing yet briefly understood aspects of womanhood in different age groups.

ABOUT THE AUTHOR :
Dr. Nikita Lalwani considers herself to be married to writing, and is very happy in this relationship. She authored her first book Live Life… Stop Analysing it, at the age of 16. Her last book 2 peg kebaad won great appreciation by its readers and critiques. Swimming, spirituality, reading, and movies are other important aspects of her life. Nikita moved to writing blogs soon after completing her college, and currently works as an advertising professional in a reputed ad agency in Mumbai.

MY REVIEW :

‘2 Day Down’ By Dr. Nikita Lalwani is a great attempt taken by the author to show case the conditions of the women. The title is perfect for the book and the sub title is thoughtful. The cover looks a bit complicated but is designed beautifully. The blurb of the book will make many things clear in your mind. The best part what I felt is that the author chose to write on those topics on which the world hesitate to talk about. All the five stories convey a powerful message to the society. The five more serious issues are talked about in the form of stories. I cannot call any one as my favourite as each story has its own value. The writing style of the author is amazing and the narrative technique is brilliant. The language of the book is lucid. Overall, it is a great read.

RATING : 5/5

ORDER THE BOOK FROM : https://www.amazon.in/Day-Down-Dr-Nikita-Lalwani/dp/9387390446/ref=mp_s_a_1_1?ie=UTF8&qid=1537762980&sr=8-1-spons&pi=AC_SX118_SY170_FMwebp_QL65&keywords=2+day+down&psc=1#

दिल की छोटी-छोटी ख़्वाहिशें

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कभी कभी दिल चाहता हैं भाग जाऊं! हाँ, भाग जाऊं सब चीज़ों से ,मन की शांति के लिए। संभाले नहीं संभल रही कुछ चीज़ें और पूरी नहीं कर पा रही हूँ अपनो की अपेक्षाएं। वो सोलह साल की लड़की जिसने न जाने कितने ख़्वाब बुने थे, ख़ुद को कहाँ पहुँचाने का सोचा था और आज जीवन उस मोड़ पर आ गया की बस यूँ ही दिन काट रही, बिन मंज़िल के चली जा रही हूँ , सफ़र खत्म ही नहीं हो रहा और न कोई नया रास्ता मिल रहा है । समझ नहीं आ रहा कि खुद को समझाया जाए या लोगों को कि उम्मीद कम रखें। दिल तो अब भी एक बच्चे की तरह खिलखिला उठता है हर छोटी खुशी में पर जब रोने की बारी आती है तो दुनिया से छुपने को एक कोना ढूंढता है। तब एहसास होता है कि कितने बड़े हो गए कि गम छुपाना पड़ रहा है और छुपा क्यूं रहें है इससे खुद भी अक्सर बेखबर ही रहते। कई बार तो यह हाल होता है कि ग़म किस बात का है इसका भी पता नहीं होता। बस ना कुछ अच्छा लगता है, ना किसी से बात करने का मन करता है। अकेलापन भाता है दिल को, सुकून का एहसास उस में ही होता है।

बहुत ज़्यादा दिखावा कर के जीना पड़ता है अब तो। पहले जिन अदाओं पर हमारे हंस दिया करते थे , मासूमियत झलकती थी , आज उन्हीं हरकतों पर लोग बातें सुनाने लगे है। “उम्र का लिहाज ही नहीं,कितनी बचकानी हरकत है” जैसी बातें सुनने को मिलती हैं, और तब लगता है कि अब तो जीना भी अपने हिसाब से मुमकिन ना रहा। जब बच्चे थे तो बड़े होने की बहुत दिली तमन्ना थी। सच कहूं तो अब वो बचपन के दिन ही ठीक लगते थे। काश वक़्त लौट पाता और हम वो दिन फिर से जी पाते!

बचपन में कोई पसंद होता था तो कितना आसान होता था यह कहना की आप बहुत अच्छे हैं, आप मेरे फेवरेट हैं। अब वक़्त के साथ यह सब कहना भी मुश्किल हो गया है। जिसको कहना है वो कहीं कुछ गलत ना सोच ले यह सोच कर अपने सर में दर्द करवा लेते है और कह भी नहीं पाते। बचपन में किसी को रोता देख कर तुरंत पहुंच जाया करते थे उसको चुप कराने। दिल अब भी उतना ही बेताब होता है जब किसी को रोता देखते है पर अब जा कर चुप नहीं करा पाते।असहाय सा खड़ा हो कर एक टक बस निहारते हैं। हर दिल में एक तकलीफ है जिसका आभास सामने वाले को होता है पर अब पूछने से डर लगता है। इसलिए तमाशा देखते रहते हैं।

सुनो ना ! अभी भी कभी-कभी ट्रेन से जाते वक़्त रोड पर खड़े लोगों को बाय-बाय करने का जी चाहता है लेकिन हाथ बढ़ा कर भी पीछे कर लेते है। अपनी खुशी से बढ़ कर चिंता होती है साथ की सीटों पर बैठे लोगों कि कि वो क्या सोचेंगे ? पता नहीं आपको करता है कि नहीं पर मुझे तो अभी भी जब वो हवाई जहाज मेरे घर के ऊपर गुज़रता है तो दौड़ कर बाहर जाने का मन करता है लेकिन कदम पीछे करने पड़ते है। अभी भी आइसक्रीम और गुब्बारे उतने ही आकर्षित करते है जितने तब किया करते थे जब पापा खुशी-खुशी वो सब ला दिया करते थे। पर अब न मांग पाते हैं और खुद खरीदने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। कौन सुने वो तानों की बौछार ?

बचपन में कोई पूछता था कि क्या बनना है तो बिना सोचे फटाफट बोल देते थे कभी कि डॉक्टर बनना है, कभी टीचर , कभी पायलट , कभी कुछ ओ कभीकुछ ! बड़े बड़े ख्वाब बचपन से ही देखे थे। आज वो ही सवाल जब कोई पूछता है तो जवाब ही नहीं होता। होता भी है तो हिकिचाते हैं। चुप रहना बेहतर समझते है। कहीं न बन पाए तो ? लोग मज़ाक उड़ाएंगे !

कोई सच में अगर जानना चाहता है कि मुझे क्या करना है तो सुने मुझे ना अपने चौबीस घंटे में कुछ आठ घंटे वो अनाथ आश्रम के बच्चो के साथ बिताना है और बाकी कुछ छह घंटे वृद्धाश्रम के लोगों के साथ। उनके लिए ही कुछ करना चाहती थी हमेशा से। करना तो आज भी चाहती हूं लेकिन अब दिल में रखना पड़ता है इस ख़्वाब को क्योंकि खुद ही उस लायक नहीं बन पाई , पता नहीं आगे भी बन पाऊं या नहीं।

कभी कभी लगता है उम्र से ज़्यादा बड़े हो गए हैं। बहुत कुछ ज़िन्दगी ने अभी ही सीखा दिया। बहुत कुछ सुनाना चाहते है लेकिन आज के भाग दौड़ में किसको इतनी फुर्सत कि बैठ कर सुने । अपने ही उलझनों को सुलझाने में सारा वक़्त ज़ाया हो रहा।

खैर! यह सब आज लिखा क्योंकि आज एहसास हो रहा था ताजी हवा में बैठ कर भी दम घुट रहा है। खुले आसमान के नीचे भी कितना अंधेरा है। सब अपनों के बीच बैठ कर भी कितना अकेलापन है। ज़िंदा तो सब हैं पर जी कोई भी नहीं रहा। दिखावे की दुनिया में असलियत ने दम तोड़ दिया है। और सब ही एक झूठी मुस्कान के साथ ज़िंदगी बिता रहे हैं ।

– निधि💕

गर इश्क न होता आपसे…. !!

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गर इश्क न होता आपसे
तो जीवन इतना मुश्किल न लगता।
इतना सोचना पड़ता
आपसे बात करते वक़्त,
और न ही उंगलिआं कंपकंपाती
आपकी फोटो पर लव रियेक्ट करते वक़्त।

गर इश्क न होता आपसे
तो यूँ मन में बेफिज़ूल के सवाल न होते
और यूँ तड़पती नहीं आपसे बात करने के लिए
न ही आपकी एक झलक देखने के लिए बेताब होती
और आपको दोबारा देखने के लिए हर दिन
वो बीस सीढ़ियां फिर से न चढ़ती उतरती

गर इश्क न होता आपसे
तो आपके तस्वीरों की एक फ़ोल्डर मेरे फ़ोन में न होती,
और न ही इंतज़ार होता आपकी नयी तस्वीर का।

गर इश्क न होता आपसे
तो दिल की बात कहने में इतनी बेचैनी नहीं होती,
आपके सामने आते ही में मन में यूं हलचल न हुआ करती,
और न ही आपसे नज़रें मिलते ही पलकें यूँ झुक जातीं।

गर इश्क न होता आपसे
तो हर सुबह 4:50 का अलार्म लगा कर नहीं उठती।
इस उम्मीद में नहीं रहती कि आपके दफ़्तर जाने से पहले
आपसे दो पल बात ही हो जाए,
और आपके पूछने पर यूँ झूठ न बोला करती
की आज नींद टूट गई, वरना तो 6 बजे उठती हूं!

गर इश्क न होता आपसे
तो हिंदी लिखने की कल्पना भी नहीं करती मैं,
न इतनी बेचैनी होतीे आपको पढा़ने की
और न इंतज़ार रहता आपके जवाब का।

गर इश्क न होता आपसे
तो यूं आपकी तारीफ़ दिन रात न करती,
न ही बनाती ये झूठी सपनों की दुनिया,
और न ही खुद को दिन रात टूटते देखती।

गर इश्क न होता आपसे
तो अपने एहसासों को समझाने की कोशिश छोड़ देती
और कहानी से कविता तक का सफर न तय करती।

गर इश्क न होता आपसे
तो डर होता ठुकराए जाने का
इश्क है जनाब! बेइंतेहा है!
इसलिए न सुनने की भी हिम्मत रखती हूं
और एक ख़्वाहिश भी, इश्क कबूलने की!

-निधि

AND WE WALKED AWAY

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The book is provided by <a href=”https://www.facebook.com/arudhaclub ”> Arudha Club</a> in exchange for a genuine review.

BLURB :

And We Walked Away revolves around the friendship of three friends in college, with a love story blooming in their hearts. It connects to the kind of boys who are in love and keep trying to convince the same girl in different ways for a long time, not moving on in life. Also, it talks about the kind of girls who don’t believe in love but also, don’t want to take advantage of a boy’s feelings. The girls who are not conservative but don’t want to pursue love.

Abhimanyu, a well-known author returns to his engineering college in Bangalore after a decade and notices a lot of changes in the college over this period. It reminds him of how he met his ladylove, Naina on the first day of college and fell in love with her at the first sight. Abhimanyu, being an impulsive, stubborn and impatient guy decides to propose her in a rush. She doesn’t believe in love and has her own reasons for it. Abhimanyu with the help of his friends Aarush and Dev proposes and tries to convince Naina many times in unusual ways but he fails miserably. However, a trick helps to melt her heart, but destiny has a different plan.

MY REVIEW :

‘And We Walked Away’ by Subrat Saurabh will definitely take you back to your college days and if you are still going to college you will relate the most with this novel. The title of the book and the cover of the book depicted two contradictory images in my mind. The blurb of the book will make you eager to know about Abhimanyu’s life.
Abhimanyu, the main protagonist of the book revisits his college after years and he himself goes remembering the memories of him, the days he has spent in college. From his best friends to his love everything seemed to come in front of his eyes like a movie. Abhimanyu, Naina, Dev, and Aarush all four of them have their own and equal importance in the novel. The novel is well paced and the language is lucid . The story ended on a note which I did not expect but then this book proved to be a roller coaster ride of emotions.

RATING : 4/5

ORDER THE COPY FROM : https://www.amazon.in/We-Walked-Away-Subrat-Saurabh/dp/1643249606/ref=mp_s_a_1_1?ie=UTF8&qid=1537432480&sr=8-1&pi=AC_SX118_SY170_FMwebp_QL65&keywords=And+we+walked+away#

CRAZY VAZY 4-LOVE

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BLURB :

When Keyur and Mitul were looking for someone to fill their proxy (fake class attendance), a smart and gorgeous girl of their class agreed to do so in exchange of tennis sessions. Mitul fell in her love while teaching tennis but she chose Keyur (a star player).
The heartbroken Mitul was asked not to self-destruct but to transform his pain into dedication and fight for a position in a Davis Cup team. Keyur, unaware of his friend’s feeling, guided him to achieve his dream while fighting with his inner demon of jealousy.
The story took a major turn when Navya realised her love for Mitul. Will Mitul go against his bestfriend and accept her? Who, between Mitul and Keyur, will be in a Davis Cup team?
The story will redefine friendship, longing for true love and passion for excelling in life.

ABOUT THE AUTHOR :

Devayu(author) is an IIM-Ahmedabadgraduate and an engineer from NIT, Surat.

MY REVIEW :

“Crazy Vazy 4 – Love” is a story about passion, true friendship and true love. The blurb of the book was enough to make few things clear. I liked the title of the book and the sub – title just amazed me.
The book holds the friendship of a group among whom Keyur and Mitul were best friends. In a party they met one of their classmate Naya with whom they had a barter system kind of deal. She wanted to learn table tennis and in exchange of that she had to mark proxy for both of them. This way the friendship blossomed between the three.
Every character of the novel has been given equal importance but at times I felt things could have been shortened. Moving to the story, the book did excite me but in the mid it was losing the charm. But the author very well managed to evoke the interest again in the readers towards the end chapters. I had expected a different ending. The language is simple. Overall, the book is a bit lengthy but a good one time read.

RATING : 4/5

ORDER THE BOOK FROM : https://www.amazon.in/Crazy-4-Love-Devayu-ebook/dp/B074BDWBNR/ref=mp_s_a_1_1?ie=UTF8&qid=1536240665&sr=8-1&pi=AC_SX118_SY170_FMwebp_QL65&keywords=crazy+vazy+4+love