वो बातें थी महज़ बातें……..!!!!

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मेरी न एक दिक्कत है, मैं लोगों के शब्दों में जल्दी बह जाती हूं। इतनी जल्दी जैसे हाय सामने वाला तो मुझ पर जान न्योछावर कर रहा हो। धीरे धीरे खुद को बहुत नुकसान पहुंचाने के बाद यह आभास हो रहा है कि लोगों की बातों को महज बात तक लेना अपने सलामती के लिए ठीक है ।
वो कहते हैं न जब भी हम किसी इंसान से जुड़ते हैं या उन्हें अपना मानते हैं तो दो ही चीजें होती है, या तो जिंदगी भर के लिए इंसान मिल जाता है, या फिर ज़िंदगी भर के लिए सबक। अगर तराजू पर तौलूं तो सबक सिखाने वाले का पलड़ा जनसंख्या में तो कम रहा पर उनके द्वारा दिए गए दुःख, तकलीफ़, अपमान का पलड़ा इतना भारी रहा कि कभी कभी लगता है की अगर ईश्वर होते हैं, और अगर किसी को दुख पहुंचाने का न्याय करते हैं, तो भगवान माफ़ करें उन्हें। कभी कभी बस हम अपनी छोटी सी बात समझा नहीं पाते, और सामने वाला अपने हिसाब से उसे कुछ भी सोच कर, उल्टा पलट वार कर देता है। वो कहते है कि इंसान जब प्रेम में होता है, तो उसे सामने वाले की गलत बातें भी सही दिखती है। सच में अंधापन का शिकार होता है इंसान। सही और गलत का फ़र्क करना नहीं आता और जब तक सही गलत समझता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वो इंसान उस रिश्ते के साथ खुद को भी खो बैठता है।

लोगों ने मुझे ओवरथिंकर का टैग दे दिया। जिन लोगों ने मुझे यह टैग दिया काश कभी वो लोग यह भी बता देते दुनिया को कि सिर्फ़ ओवरथिंकर ही नहीं, ओवर केयर करने वाली, ओवर प्रोटेक्टर, भी थी। और कोई इंसान ओवरथिंकर क्यूं बनता है? जब उसे छोड़ दिया जाता है, दो सवालों के बीच। अगर एक इंसान अपनी मन की बात कहना चाहता है, तो क्या एक बार सामने वाला उसे चुप चाप सुन नहीं सकता? जरूरी है उसके हर एक स्टेटमेंट को काटना और अपना पक्ष रखना। क्या कोई कोर्ट केस थोड़ी चल रहा है, जो गलत होने पर सज़ा सुना दी जाएगी।

कभी कभी लोग, अपने ऊपर पूरा विश्वास दिलाते हैं, खुद ऐसी बातें करते हैं कि आप उन पर आंख बंद कर विश्वास कर लेते हैं और फिर आपको ही कहते हैं, मैंने कहा था विश्वास करने को? कभी कभी जिस पर सबसे ज़्यादा यकीन करें वो ही आंखों में धूल झोंक जाता है, पीठ पर खंजर मार कर जाता है। मैंने अपने बीते कल से सीखा है कि लोगों की बातों पर यकीन नहीं करना चाहिए, उनकी हरकतों पर करनी चाहिए। कोई लाख कहे, हम पर विश्वास करो; मत कीजिए, एक बार परख लीजिए, क्यूंकि दुख और मुसीबत में पता चलता है कि कौन अपना है। और जो इंसान दूसरे के विश्वास को दो कौड़ी का समझ कर अपने जूतों तले रौंद देते हैं, भगवान न करें कभी आपके विश्वास को कोई अपना ऐसे ही कुचल दे, तो एहसास होगा कि तकलीफ़ किसको कहते हैं और घुटन कैसा होता है!

– निधि

( 3-04-2022 )

प्रेम और मुलाक़ात ।

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आज के दिन ठीक एक साल पहले आपको देखा था। सोचा नहीं था, आखरी बार आपको देख रही थी। और क्यूं ही सोचती, भले आप मुझसे लाख ख़फा भी होते, मेरा आपको सिर्फ़ जी भर देख लेने का हक नहीं छीन सकते थे। खैर जी तो कभी भरता ही नहीं था। पर पिछले साल 7 फरवरी को सच कहूं तो दिन बिल्कुल नहीं चाहती की आपसे नज़रें मिले। उस दिन आप मुझे देख कर अपने मन में गलत फहमी पाले इसलिए नहीं चाहती की आपसे मुलाकात हो। पर ख़राब नसीब का क्या ही किया जाए,आप सड़क किनारे एक चाय के दुकान पर खड़े थे, और ठीक उस ही वक्त जिस ऑटो में मैं बैठी थी, वो गुज़रा। आपको अनजाने में भी देख लूं, यह तो बिल्कुल भी नहीं चाहा था और अगर देख भी लूं तो आप मुझे बिल्कुल नहीं देखे, ऐसा सत प्रतिशत चाहती थी।
खैर, होनी को किसने टाला है आज तक। जैसे ही मेरा ऑटो आपके सामने से गुज़रा हमारी नजरें टकरा गई। ओह शिट!! झट से मेरे मुंह से निकला और अपने आंखे बंद कर ली। जैसे मेरी आंख बंद करने के बाद आप भी मुझे नहीं देख सकते हो। यूं कहते है न की प्यार में इंसान बावरा होता है बस यूं ही था मेरे साथ। खैर मुझे पता था आपने देख लिया था मुझे। उस ऑटो में बगल में जो दोस्त बैठी थी, उसको भी नहीं बोल पा रही थी। और हर बार की तरह आपको देख लेने के बाद जैसे दुनिया का सब कुछ भूल जाती थी, वैसा ही हुआ। जहां उतरना था, वहां से कुछ आगे जा कर याद आया की उतरना था पीछे ही। खैर, ऑटो रुकवा के, जब रिक्शा किया तो मेरे घर जाने का सबसे निकतम रास्ता आपके घर हो कर गुजरता था पर एक ही दिन में एक ही हादसा दो बार हो जाएं ऐसा तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए। वरना मुझे एक बार वहां देख कर आपके मन में जो गलत फहमी पली थी, वो यकीन में बदल जाता इसलिए दूसरे रास्ते से जाना चुना।

कहते है जिस से प्रेम होता है उस से डर नहीं होता और सच भी है जब तक इस प्रेम पर गुस्सा, गलत फहमी , सब हावी नहीं हुआ था, तब तक बेकौफ बहुत कुछ कह जाती थी। आंख में आंख डाल कर बोलने की हिम्मत रखती थी, की आपको देखने आई हूं। खैर, जब रिश्तों में दरार आने लगी तो चुना मैंने भी मौन को। ताकि जो है जैसा है उसको समेट लूं, बस आपके होने भर के एहसास से ही खुश रहती थी मैं। कभी – कभी लगता है, आपसे दूरी भगवान की सज़ा है क्यूंकि रोज़ सुबह मंदिर के लिए निकलती थी मैं और भगवान से पहले आपको देखती थी और तब उनके पास जाती थी। भगवान के ऊपर भी मैंने प्रेम को रखा था।

खैर कैसे एक साल बीत गया और हमारे बीच बचा है चुप्पी। दुबारा आपको नहीं देख पाने का टीस शायद रहेगा हमेशा। काश उस दिन यह पता होता की आपको फिर शायद नहीं देख पाऊं तो शायद आंख भर कर, जी भर के देख लेती। पर कहाँ पता था की दुबारा हमारे रास्ते नहीं टकराएंगे। हम दुबारा नहीं मिलेंगे। ऐसा नहीं है की अब याद नहीं आती, या अब बात करने का मन नहीं करता पर अब शायद बहुत सब्र आ गया है। और आता भी क्यूं नहीं , जिससे प्रेम किया, उसके सब्र से ही तो प्रेम हुआ था। प्रेम में अच्छे अच्छे पागल हो जाते है और एक दिन मज़ाक में कहा था मैंने की एक दिन आपके पीछे मैं सच में पागल हो जाउंगी। किसने सोचा था, ऐसा हो भी सकता था। मैं पागल ही तो थी, जो आपके ऊपर चुना मैंने मौत को, अपने ही अपनों को रोते हुए छोड़ देने का निर्णय ले लिया । इससे बड़ा पागलपन और क्या ही होगा। कभी कभी अपने ही दोनों रूप को देखती हूं तो सच बोलूं तो खुद पर तरस आता है। काश इन चोटों का भी इलाज़ डेटॉल लगा कर उस पर पट्टी कर के हो पाता। तो यकीन मानिए मैं खुद को ही बहुत प्यार से मैं हर एक चोट का इलाज़ करती। खुद को खुनाखून देखते हुए भी मैं चीखती रही तो एक इंसान का नाम। शायद इतना टूट गई की मैं खुद को ही कभी प्यार से गले लगा कर कहना चाहती हूं की प्यार करना तेरे बस की बात थी, उससे महज़ अच्छाई की भी उम्मीद गलती थी तेरी।
खैर, पता नहीं कितने साल लगे इस दर्द से निकलने के लिए, पर शायद जब जब अब प्रेम पर लिखूं, दर्द पर भी लिखूं, अपने ऊपर किए खुद के अत्याचार पर लिखूं, आपके द्वारा अत्याचार पर लिखूं, शायद यह लिख लिख कर अंत कर दूं अपना या शायद …………..!!!!!


– निधि ( 07/02/2022)

एक हजारों में मेरी बहना है।

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प्यारी जीविका और मानवी,

एक हजारों में मेरी बहना सीरियल से लोगों ने जाना यह दोनों ही नाम आज से 11 साल पहले । लोगों ने देखा एक बहुत खुबसूरत रिश्ता दो बहनों का जो एक दूसरे के लिए अपनी जान देने के लिए राज़ी थी।
टीवी पर आधे घंटे का सीरियल कब सालों तक हमसे यूं ही रिश्ता जोड़े रखता है। दुनिया का पता नहीं पर मैं उन किरदारों के साथ उन्हें जीती हूं। मैं जीती हूं हर एक एहसास को। भूल जाती हूं की यह तो सिर्फ़ एक कहानी है जो देख रहे है। जीविका और मानवी का इतना अटूट प्यार शायद अब ढूंढ़ने पर भी नहीं मिले। मैंने कभी सोचा भी नहीं था की एक देखा हुआ पूरा सीरियल मैं दुबारा देखूंगी वो भी सालों बाद क्यूंकि इसके किरदार ने मेरे दिल पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ दिया है।

मैंने अपने असल जिंदगी में दोनों ही क़िरदार जीया। किसी के लिए जीविका बनी, और अब किसी के लिए मानवी हूं।
भले उम्र में दोनों ही बार मैं बड़ी रही, पर क़िरदार दोनों बखूबी निभाया। अपनी जिंदगी में इन ही तीन साल में मैंने यह सफ़र तय किया। जब मैं किसी के लिए जीविका बनी, तो मैं बहुत सुलझी हुई शांत लड़की हुआ करती थी, जो बहुत बहुत सोच कर निर्णय लेती थी। जो हर वक्त दूसरों को अपने ऊपर रखती थी। जिसको अपनी ज़िंदगी की मानवी माना, उस पर एक आंच न आए, इस बात का पूरा ज़िम्मा उठाया। इन सब के पीछे कोई स्वार्थ नहीं रहा, या फिर ऐसा कुछ की ऐसा करना है यह कुछ सोच के रखा हो, यह तो इत्तेफाक था की हो गया। पता नहीं इतनों की भीड़ में जिसे मानवी चुना अफसोसन उसने मुझे अपनी ज़िंदगी की जीविका नहीं माना कभी। दुःख तो खैर बहुत हुआ पर दुनिया है, लोग है, सबके अपने रंग, सबके अपने तरीके, पर उस मानवी को कभी कुछ महसूस हुआ या नहीं, पर जीविका का किरदार निभाते निभाते मैं भूल गई, की रिश्ते दोनों तरफ़ से होते है। खैर सिर्फ़ दुख है पर सुकून भी है। सुना है भगवान अच्छे नियत वालों के साथ अच्छा करते हैं। यह सोच ही तसल्ली से जीने देती है।

अब खैर अगर कहूं मानवी का क़िरदार अदा करने की तो मेरे से छोटी ने मेरे जीवन में जीविका की भूमिका निभाई। मैं जब जब टूट कर बिखरी, वो छोटी बहन, बड़ी बहन कर, मुझे संभाला, मुझे समेटा। मुझे डांटा, मुझसे प्यार किया। मुझे समझाया, मुझे थामा। मैं शुक्रगुजार हूं उस रब की जिसने मुझे इस जीविका से मिलाया की जो मेरे हर दिन हंसने की वज़ह बन जाती। कभी कभी लगता है की लोगों को अपना मानते मानते मैं भूल जाती हूं अक्सर की मैं भी एक इंसान हूं जो चाहता है की कोई मुझे भी समेटे, संभाले।

पता नहीं इस दुनिया में कितने ही बहनें होंगी जो जीविका और मानवी जैसा रिश्ता निभाती होंगी, पर अगर निभाती होंगी तो यकीनन आपसे खुशनसीब कोई नहीं होगा। इस जुड़ाव का एक और पहलू यह भी है की जब आज भी मैं कृष्टल देसूजा और निया शर्मा को एक साथ देखती हूं तो मुझे उन में मानवी और जीविका दिखती है। दिखता है वहीं अपनापन, वहीं प्यार। कितना खूबसूरत होता है न यह एहसास की जिन किरदारों को सिर्फ़ आप अपने काम के लिए जीते है, उनसे ताउम्र सफ़र जुड़ जाता है। आज भी वहीं प्यार, वहीं अपनापन देखने को मिलता है आपकी तस्वीरों में , आपकी विडियोज में। 11 सालों के बाद भी जब जब आप दोनों की तस्वीर देखती हूं मुझे सदैव मानवी और जीविका ही दिखती है। वजह तो नहीं पता पर जब जब मैं देखती हूं तो एक खुशी का एहसास के साथ एक गम साथ आता है। अब इन दोनों में किसका वजन ज़्यादा है, यह नहीं पता। पर कभी कभी जैसे कुछ रिश्तों को देख कर ही उन्हें जी लिया जाता है वैसे ही मैं अपने हिस्से की जीविका को सिर्फ़ टीवी स्क्रीन पर देख कर जी लेती हूं।

बहुत बहुत मोहब्बत, जीविका और मानवी को !

– निधि

प्रेम के नाम

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प्रेम के नाम,

पता नहीं यह चिट्ठी आप तक जाएगी भी या नहीं! पर हां, अगर पहुंचे तो पढ़ लीजिएगा !

सोचा था, बहुत लडूंगी आपसे! बहुत शिकायतें थी! बहुत तकलीफें थी! पर वक्त ही नहीं आया ! खैर, अब कुछ बोलना भी नहीं ! मेरी शिकायतें दूसरी थी,आपकी समझ दूसरी। पर इन दोनों के बीच फस के रह गया मेरा रिश्ता, जो चढ़ गया गुस्सा, नाराजगी, गलतफहमी के भेंट। क्यूंकि मुझे प्रेम था, इसलिए मेरी कही हर एक बात आपके नज़र में वो रूप ले लेती थी, पर उस प्रेम से परे भी बहुत कुछ था जो लाख समझाना चाहा था, पर समझा नहीं पाई थी! अफ़सोस है नहीं समझा पाई! पर अब ज़िद भी नहीं समझाने की। क्यूंकि अगर एक बार कह भी दूं सच सच मन की बात, तो भी मैं गलत दिखूंगी, मैं ही कटघरे में खड़ी रहूंगी! और शायद अब इतना समझाने की हिम्मत भी नहीं! यादों के नाम पर मेरे पास तो कुछ भी ऐसा नहीं, जो समेट कर रख लूं, पर हां वो आपका दिया चॉकलेट, उसका रैपर आज भी मेरी अलमीरा में है! उन्हें देख कर , हमारी बीच की अच्छे वक्त की याद आ जाती है और मुस्कुरा लेती हूं! मेरी अपेक्षाएं ही आपसे ज़्यादा हो गई, शायद आपके थोड़े से अपनेपन ने वो हक दे दिया था।

मैंने अपनी भावनाओं को कब का मार दिया। जैसे सुशांत सिंह राजपूत मरते वक्त बहुत बातें अपने ज़ेहन में ले गया, सिद्धार्थ शुक्ला अचानक मर गया, अपनी बातें अपने दिल में समेट कर मर गया होगा। किसी से अंतिम क्षण उनसे पूछा भी नहीं होगा, की कुछ कहना चाहते हो? कुछ बताना चाहते हो? और वो अपने साथ ले गए अपनी संवाद, दुनिया से दूर। बहुत दूर! ठीक उस ही प्रकार, मैंने अपनी बातों को मार दिया है । स्वीकार कर लिया है मैंने की कुछ बातों को नहीं बताया जा सकता है, नहीं कहा जा सकता है। नहीं समझाया जा सकता था! क्यूंकि बातें तब समझानी चाहिए जब कोई उन्हें सुनना चाहे, तब नहीं जब हर एक बात के लिए सामने वाला अपने तर्क ले कर खड़े हो! यह समझते समझते मुझे बहुत देर हो गई! ऐसा नहीं है की इस बीच सिर्फ़ आप दूर हुआ, बहुत कुछ दूर हुआ, बहुत रिश्ते छूट गए, कुछ अपने खो गए, जिन्दगी ने फुल स्टॉप लगा ली, पर हां सांसे चल रही थी! खैर गलतफहमी दूर हो जाती हमारे बीच तो शायद मन भी शांत हो जाता। फांसी से पहले अपराधी से उसकी अपनी अंतिम इच्छा पूछी जाती है, काश कोई हमसे भी पूछ, हमारे बीच की गलत फहमी मिटा देता ! पर हां एक दिन मेरा पक्ष आप ज़रूर सुनेंगे शायद पढ़ेंगे, जब यह मेरी किताब में छपेगी! अपनी गवाही मैं वहीं दूंगी, जहां सामने वाला पूरा सुन कर निर्णय लेगा, न की आधा सुन कर सज़ा – ए – मौत फैसला सुना देगा!

खैर, जाने दीजिए! यह कहने कहवाने की बातें, कौन सही कौन गलत, इन सब ने अब बचा भी कुछ नहीं! सब अपनी जगह सही ही है! मीरा कृष्ण की भक्ति कर के प्रसन्न रहा करती थी! शायद आपके नाम, अब और कोई पत्र इस जन्म में न लिखूं, आपके नाम लिखूं भी तो अपना प्रेम न लिखूं! आपने सब्र रखना सिखाया था, उम्मीद है ताउम्र यह गुण मेरे अंदर रहें! सदा खुश रहिए !

– निधि !

IN LOVING MEMORY

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BLURB :

Dhruv is the popular dashing guy in Nisha’s office. His impulsive antics irk her, but also attract her. From the day Dhruv enters her life, she starts getting anonymous threatening late night calls and scary nightmares that seem too real. Who is this Dhruv? What’s his connection with the strange happenings in her life? Can she trust him?

Nivas is a guy you wouldn’t notice in a crowd. Rimi is a chatterbox and the polar opposite. Naturally, Nivas is drawn towards her and gains the courage to propose to her, desiring more of her. Things turn ugly from then on between the two.

As the stories of the two couples converge at an unexpected turn of events – Kevin, the best detective in town, ends up with a peculiar case. Everything about the case is confusing, contradictory and downright clumsy! A cat-and-mouse game ensues with everyone’s life at stake.

Every story has one ending, will this one too?

MY REVIEW :

In Loving Memory By Daniel Paul Singh, is a love story or rather, I should say a thrilling love story. A not so simple romance tale but with so many twists and turns that the excitement level is same till the last line of the book.
The blurb of the book will not give you many hints about the book. Yes, one might know that the book holds the suspense as in the blurb – the mention of the detective is there, but I bet no one can know the extreme level of riddles within the pages, before completing the whole book. The book starts with Dhruv and Nisha working in the same office and parallel to that another love story – of Nivas and Rimi unfolds. The bond between Dhruv and Nisha keep growing with each passing day. Similarly, was the connection between Rimi and Nivas.
As you go on, Nisha decides to marry Dhruv against her parents’ wishes and she dies on the night of her marriage. It was a clear suicide case but was it really a suicide? What made Nisha commit suicide or was it a planned murder? The part that could keep you on tenterhooks begins here and the excitement level arises. And, the entry of Kevin makes this book all the more an amazing read. Overall, it was super exciting reading experience with many secrets unfolding. I would love to suggest this book to all those who are looking for some mysterious thriller romance sort!

RATING : 5/5

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WE MET FOR A REASON

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BLURB :

“We met for a reason”, is an intriguing story of a guy named Karan who met three different women at various phases of his life. It moves with how he went on a roller coaster ride of emotions while dealing with these pretty nymphs and his own idea of life, where relationships are beyond the emotional tie ups, have zero expectations and absolutely no commitment.

Karan was fortunate enough to experience the real flavours of love in the form of warm affection, spicy sex and sour betrayal. His idea of romantic relationship is something which starts with a friendship, progresses with fingerlicious food at a restaurant, gets intense in a pub, gets sealed with a lip lock and later dissolves into a one-night stand. However, destiny had a different plan where he ended up falling in love with a girl, whom he thought to be, just another pawn in his journey of self-satisfaction.

Sometimes even a short-lived relationship or an incident creates a huge impact on a person’s mind and may change the direction of his life. Life goes through a drastic change for Karan due to an incident and he realizes the importance of relationships.

MY REVIEW :

We Met For A Reason By Subrat Saurabh is not a typical love story but a story with many twists and turns. The blurb of the book itself conveys a small idea of the book but one cannot just guess the whole story by the blurb as the pages insides holds many secrets.
The title of the book is apt or I must say, no other title would have done justice to the book. A simple yet suitable title for the book. The cover of the book is miraculous.

The book starts with the story of the main protagonist of the novel, Karan, who is working in Stockholm since years and got attracted to one of the newly appointed employee in his office, Ankita. Karan was trying all ways to spend time with Ankita and try to impress her with something or another.
The story further moves with Karan’s transfer to Mumbai where he met another two girl, Shanaya and Shalini. The pages holds many ups and down about casual relationship and serious love.
There are few quotes from the book that I loved and completely agree to it.
1. When you are struck by the arrow of love then every small thing sounds good, looks breathtaking and feels mesmerizing.
2. Like two failed people can’t lead a successful life, two successful people can’t lead a peaceful life.
3. When you run away after love, love runs away from you, when you look away from love, love will be drawn. This is the beauty of love.

Overall, it was a simple love story with lots of emotions included. The book can be finished in one read. I liked the storyline except a line from the book that the author could have avoided using, ” Sorry! That’s me”. I felt repetitive use of this phrase was not needed.
Apart from it, it was an amazing read.

Rating : 4/5

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THE UNEXPECTED LEADER

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BLURB :

Ajith, the CEO of India’s most popular coffee chain, Good Morning Inc., is outrageously shocked to hear the pitch from a tech startup: fire all managers and replace them with AI. Though he wants to dismiss the idea, the pitch is ferociously compelling. Before Ajith could take a firm decision, an unexpected tragedy occurs at one of the coffee stores. Ajith loses control over his company overnight. He stages a secretive reverse coup to regain his company.

At the same time, the office of the WHO issues a warning about a global respiratory pandemic to the Indian government, but the prime minister’s office ignores it. Instead, it spends its focus on the developments of Good Morning Inc. Why would the PMO’s office be interested in the incidents of a corporate entity?

Rahul is excited to meet his blind date at one of the coffee shops of Good Morning Inc. What he doesn’t know is that he is just a pawn whose actions are about to trigger an avalanche of consequences in the lives of many people, related and unrelated to Good Morning Inc.

Will Ajith ever regain his company? Will he become the first CEO in the world to successfully use artificial intelligence instead of human leaders to manage its workforce?

MY REVIEW :

The Unexpected Leader by Joel Sadhanand is an interesting and engaging story.
The title of the book is catchy. The blurb itself arouses the interest at once. The cover of the book is simple and beautiful. I would rather say, the book is interesting but it depends upon how much your into the context you are, while reading it. The framework of the story is based on corporate life. You will totally enjoy it if you are business oriented and if you are someone who loves reading out of the box genre. You might take time to understand and get connected with the story line in the beginning but then once you are set, you will start to enjoy the book and it will grow on you with each passing page.

The book holds the story of CEO of a coffee chain in India, Ajith who is suggested to replace all his managers with Artificial Intelligence. Before Ajit could implement the idea, another shocking tragedy took place at one of his coffee bars. The books potrays the story of how two brothers gets entangled in chaos in the lure of actual power.  There is a set if interesting characters with their share of tale in this book.There is Bhagwandas, along side the main leads who rose from a journalist to editor quite quickly; it is interesting to follow his path as an unknown call changed the wheel of fortune. Another interesting character scale is of Shreya, daughter of Aryan and Anita who was a box full of questions; unfortunately, she was also suffering from Wilson’s disease. The book also takes a side to tell about Neha, who even after getting her loan approved faces many problems in life. Then there is also the character Rahul who is on his way to meet his girlfriend unaware of the fact that his life is in danger. The book consists of many more characters with different stories.

The language of the book is simple and easy to understand. The book isn’t totally related to business but it does holds a parallel political storyline. Overall, I would say if you are bored of reading common genres and looking for something different, this book is totally recommended. If the book is to described in one line – it is a sci-fi one with a full dose of corporate drama.


RATING : 5/5

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AN INCOMPLETE LETTER TO SUSHANT SINGH RAJPUT

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16/04/2020


Dear Sushant Singh Rajput,

I am writing this letter to you in lockdown because once the lockdown gets over you won’t have time to read this. But in this lockdown, I have a hope that you may read this.

To be honest, I am a huge huge fan of M.S Dhoni. When the movie was being made on him and you were the person playing the role of him , this was double happiness for me.
I have admired you as Manav from Pavitr Rishta but after M.S Dhoni The Untold Story you were always in my heart. I was so excited for 30th September 2016 when this movie was to be released. People in my class kept on saying me that you’re not gonna watch the movie today. Even I knew that Darbhanga did not have a Multiplex then, so I had to wait till the movie was either available for download or was telecasted on Television. When I watched the movie, Trust me multiple times I had this feeling that is this Sushant playing the role or actual Dhoni on screen ? What a versatile actor you’ve been.
On 28th May 2017 you tweeted regarding talking to your fans. I posted a question with a #AskSSR .
Although, I could have asked something else to you but I don’t remember what was going inside me. May be I was in a bad mood and I had no one to share my feelings and I tweeted you this question.
I knew I won’t get a reply as my question would be lost in millions of questions asked by your fans but I still twitter it.
I couldn’t believe when you actually answered my question. I was on heaven seven. I jumped all over the house saying every member of my family than Sushant Singh Rajput just replied to my tweet. I called many of my friends to let them know the same. For me the whole next day was all about, ” Sushant Singh Rajput replied to your tweet. “

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( This was my half written letter that I couldn’t complete on time. I never knew I had so little time in hand. I never knew that you will never read this letter now. If I would had known this, I would have completed it in April itself no matter how much ill I was.)

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14/06/2020

Today, I am completing this letter with a regret in my heart. I wish I had completed the letter on time. All my closed one knew that I admire you, respect you so much. I always kept asking my friends in Mumbai if they have ever seen Sushant Singh Rajput in real? In April, one day I was on a call with Suhail Sir and he told me that one day he was standing outside his office and he saw Sushant Singh Rajput. I got so excited hearing this and like a kid I told him and next time when you see him please go and ask him if you are planning to write a book in future? And I had imagined this whole scenario in my head.

I followed you on all social media platforms and yes, many like me follow you on Social Media. Whenever I went through your Instagram posts, I could feel a depth in it. Either it was something related to science or spirituality. What amazed me more, was a question at the end of the post, that always promted me to comment.
I remember there was a post on life on Instagram and I had commented late night on that post. Next morning, when I woke up, my Instagram notification said, ” Sushant Singh Rajput started following you. ” I rubbed my eyes again to read the notification. For a second, I thought that to be one of your fan pages but when I opened the profile, it was the real Sushant Singh Rajput following me.
6th June 2019; screenshot taken. Posted all over the social media. For me this was like something unbelievable. My one answer winning your heart was something I had never imagined. You know, I have a wishlist of mine, that I always want to do once I get a job.
I had always thought that once I would get a job, I would go to Mumbai, and would try my best to meet you. Meeting you wouldn’t be so easy but I will give my best. Although, you proved that meeting you really isn’t easy.

Sushant Singh Rajput, you were an inspiration to many youth.
” एक साधारण बिहारी क्या कुछ नहीं कर सकता, यह आपने साबित किया था। “
You were not only a great actor, you had secured 7th Rank in AIEEE that proves how well educated you were and above all how well knowleged you were. Your movies were full of motivation. I wish you could have seen M.S Dhoni once or Chhichhore once before taking this step.

It was your dialogue in M.S Dhoni,

” कभी – कभी  दिल करता है कि सब कुछ छोड़ कर वापस चला जाऊं, फिर उस बाप का चेहरा सामने आ जाता है। “

I wish you could have heard this dialogue of yours once before breaking so many hearts all together.

Even this was the dialogue you delivered to the world in Chhichhore,

” हम हार जीत , सक्सेस फेलियर में इतना उलझ गए है कि ज़िन्दगी जीना भूल गए है। ज़िन्दगी में अगर कुछ सबसे ज़्यादा इंपॉर्टेंट है .. तो वो खुद ज़िन्दगी। “

आज आपने मेरा दिल बहुत ही टुकड़ों में तोड़ा है। इस चिट्ठी के अंत में श्रद्धांजलि देना पड़ेगा यह तो मैंने कल्पना तक नहीं की थी।

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My dream to take your autograph, to click a picture of you although broke today. But you will always stay in my heart forever.

Rest In Peace Sushant Singh Rajput. I love you and will always love you.

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“जैसे तुम्हें दुनिया प्यार करती है,
वैेसा भी कोई प्यार पाता है क्या भला ?

जैसे तुमने करोड़ों दिलों को तोड़ा,
ऐसा भी कोई दिल तोड़ता है क्या भला?

जैसे तुम चले गए,
ऐसा भी कोई जाता है क्या भला? “

– Nidhi 💙 ( The girl who wanted to meet you once )

A TRIBUTE TO RISHI KAPOOR

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When you grow up watching certain personalities, they leave a great impact on your mind. Rishi Kapoor Sir; I have grown up watching your movies on television. From the time, I have gained senses; I had just two channels to watch on my television. All thanks to my television addiction that my parents had to cut cable connection and I had to switch between the two channels only. I used to eagerly wait for Sunday’s afternoon so that I could watch that three hours long movies. All my childhood, I have watched all the old movies that were the blockbusters of those times.
My father always says, “पिक्चर तो हमारे ज़माने में बनते थे!” I was a small kid at that time that was too small to understand the depth of the lines. With the passing of time, as I grew up; re-watched those movies, the storylines, the songs all started making sense out of sudden. I would be in a state of awe for hours. All those movies surely leave a footprint on the mind forever.

Many people in my family admired you a lot and years later, I know and found the reason why. As joyful, you were on screen, you were in real life too. Your movies had the same charm as you had on your face. Your movies were so lively and that’s the reason, even the present generation admires you so much. Do Dhooni Chaar, Karz, Kapoor and Sons, Deewana, Yeh Vaada Raha, Agnipath; every movie has its magic.

Most of my mornings begin with,

” सोचता हूं अगर मैं दुआ मांगता,
हाथ अपने उठा कर मैं क्या मांगता,
जब से तुझसे मोहब्बत मैं करने लगा,
तब से जैसे इबादत मैं करने लगा।”

And my nights end with,

“मेरी किस्मत में तू नहीं शायद,
क्यूं तेरा इंतजार करता हूं?
मैं तुझे कल भी प्यार करता था,
मैं तुझे अब भी प्यार करता हूं।”

Not only these but also,”सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं, यह दिल बेकरार करें कि नहीं!” and ” पहले तो मैं शायर था, आशिक़ बनाया आपने! “,are in my top list.

Born in the 20th century, modern era society, in the generation where love is no more a strong emotion, where love isn’t any more a symbol of purity, I am the girl who believes in old school love. The love for which people sacrifices their life, the love that stays alive in the heart forever, even after separation. And for all your romantic movies, take a bow, sir. The romance you shared on the screen will always be alive in my heart. You will always stay alive in our hearts and our memories. The industry, the world lost another star today. Rest In Peace Sir.

A TRIBUTE TO IRRFAN KHAN

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I can write thousands of words for someone special, but at times when emotions are too high; when I actually have to write real emotions, I fall shorts of words. Today is one such day. Irrfan Khan Sir, it was just too early. I hoped this to be a piece of fake news but Alas! This was just the harsh truth of today. The world lost someone, in front of whom all the adjectives would fail to appreciate him. You were a gem.

We admire actors because of their acting skills, we admire them for the way they carry themselves in front of the camera. We know that part of their life that they let us know. But the only reason that so many people love you or I must say that people are so broken by your death because you were the same person always whether you’re on camera or without a camera. You were always the same. You have proved that not everyone needs someone from Bollywood in family, to begin their career. You have proved that not everyone needs that dashing entry look to begin their career. You proved that not everyone needs support to rise high and shine. You have proved that your hard work, determination, is solely responsible for your success and you have surely made an impact on the present generation. I feel no one would forget those amazing dialogues you have delivered in your movies. Some of your dialogues have just made a permanent place in my heart and mind.

* चांद पर बाद में जाना ज़माने वालों, पहले धरती पर तो रहना सीख लो!

* आदमी का सपना टूट जाता है ना, आदमी ख़त्म हो जाता है!

* यह शहर हमें जितना देता है, बदले में कई ज़्यादा हमसे ले लेता है !

* दिल-ए-नादान, तुझे हुआ क्या है? आखिर इस दर्द की दवा क्या है?

* नींद ना माशूका की तरह होती है, वक़्त ना दो तो बुरा मान कर चली जाती है !

All these relatable dialogues from your blockbuster movies are echoing in ears in your voice. The feeling cannot be expressed.

As Irrfan Khan said in one of his interviews, “I try to do films which leave a longer impact, which speak to you and which keep coming back to you after you’ve seen them.”

I would rather say, Sir not only as an actor but as a person too, he has left the same impact on society. Today, I could feel all the people mourning. Everyone has the same feeling that someone from their own family has left the world. I wish you could be back; I wish we could still watch you on screen. I wish we could admire more of Irrfan Sir on screen. I wish you could still win this battle like you won the battle of neuroendocrine tumors. I wish you would have not left so early.

तुम्हें पर्दे पर जितना देखा, जितना
सुना;
तुम्हें और देखने सुनने की चाह बढ़ गई,
अभी तो तुमने ज़माने को और किस्से सुनाने थे,
और तुम लाखों दिलों को यूं तोड़ गए!

Your death has proved it again that Life is brutally cruel. Rest in Peace Sir.