हमारी दोस्ती की कहानी ❤

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” यह दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे
तोड़ेंगे दम मगर
तेरा साथ नहीं छोड़ेंगे। “

साल 2011, जुलाई का महीना, Tagore Senior Secondary School, Mayapuri,New Delhi

नया स्कूल , नए लोग। परेशानी लेकिन वो ही पुरानी। अब दोस्ती कैसे किया जाए? खुद बात करने जायुंगी तो चेप समझेंगे, नहीं गई तो सोचेंगे कितना अकड़ है इस लड़की में! इस है दुविधा के साथ मैंने स्कूल का पहला दिन बिताया। कुछ लोगों को देख कर एक मुस्कान भर दी और दिन खत्म हुआ। एक हफ्ता कुछ यूं ही चला ही था,कुछ लोगों के साथ हल्की फुल्की बातें और कुछ को तो अब तक पहचाना भी नहीं था, तब ही क्लास में आगमन हुआ एक नई लड़की का। पता नहीं क्यूं पर वो सीधा आ कर बैठी मेरे बगल में। मुझे भी राहत की सांस मिली की चलो एक बेंच पार्टनर मिला मुझे भी, नाम था उसका DEEPIKA. एक दिन मैंने उससे जितनी बातें की शायद ही मैंने उस एक हफ्ते में किसी से करी होगी। ऐसा लग रहा था जैसे बरसों के बिछरे हो हम। एक सेकंड के लिए भी नहीं लगा कि पहली मुलाक़ात है इसके साथ। वक़्त बीतता गया, दोस्ती गहरी होती रहती। मोहतरमा शाहिद कपूर की बहुत बड़ी फैन थी। मैं अक्सर उसे शाहिद की बहन बुला दिया करती थी। बहुत चिढ़ जाया करती थी, लेकिन करती भी क्या? एक साल में ही पूरे स्कूल में हमारी दोस्ती की चर्चा होती थी। कभी गलती से भी स्कूल corridor में अकेले चले जाए तो तुरंत कोई ना कोई पूछ लेता था कि आज तुम्हारी दोस्त नहीं आयी? इससे अंदाजा लगाया जा सकता है की कितनी गहरी रही होगी हमारी दोस्ती।

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मैं DTC bus से आया करती थी स्कूल और Deepika आती थी School bus से। स्कूल पहुंचने के बाद मेरा एक ही काम होता था इसके बस का आने का इंतज़ार। क्यूं? भाई, आधे समय मैडम की बस ही छूट जाती थी। इसके घर के पास एक मैम्म रहती थी। कुछ समय बाद Deeksha ma’am मुझे सुबह अपनी ओर आते देख कर पहले ही बता देती थी नहीं आई दीपिका या फिर आई है। हसीं तो बहुत आती थी लेकिन वो भी समझ गई थी कि दोस्ती ही ऐसे ही।
वक़्त के साथ ठंड के मौसम में तो बस छोड़ने का रिकॉर्ड बना लिया दीपिका ने। मुझे लगता है बस वाला दीपिका से बहुत खुश रहता होगा। ऐसा बच्चा और कौन होगा जो हर महीने बस की फीस देता था पर आता शायद दस ही दिन था। बाकी बीस दिन दीपिका ऑटो वालो का भला करती थी। ऑटो से स्कूल आया करती थी। पर इसने कभी भी DTC बस वालो का भला नहीं किया। चढ़ना ही नहीं आता था बस में इसको। कितना भी समझाया , सिखाया, लेकिन नहीं का नहीं। आज भी याद हैं इसके एक जन्मदिन पर मेरे बैग बस इसकेे लिए गिफ्ट्स ही थे। उस दिन मैं स्कूल एक भी कॉपी किताब ले कर नहीं जा पाई। पूरा बैग भर गया था। लेकिन हर एक टीचर से बचते हुए पूरा दिन निकाल ही लिया था।

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क्लास के बच्चो , स्कूल के टीचर्स के इलावा अब हम दोनों को साथ देखने की आदत हर एक को हो गई थी, फिर वो चाहे स्कूल के peon हो या फिर दूसरे क्लास के बच्चे।
उस दो साल में ज़िन्दगी जी ली थी मैंने। बहुत ज़्यादा मज़े किए थे। स्कूल के बाद, हम एक ही ट्यूशन में पढ़ते थे। एक दिन में हम 10 घंटे साथ रहते थे पर उसके बाद भी हमें फोन पर बात करनी होती थी। तब कहा थे smartphone का ज़माना। और वो बटन वाले फोन भी पापा मम्मी का ही हुए करते थे। पर क्या फर्क पड़ता था। हमारी बात हो ही जाती थी। 2-3 घंटे। घर वाले भी सोचने पर मजबूर हो गए थे कि इतनी क्या इनकी बातें रहती है। अब उन्हें कौन समझाए। बहुत बातें होती है जो करनी होती थी। फिर वो पढ़ाई की मजबूरी भी तो थी। उसकी बातें भी तो करनी होती थी। और फिर एक दिन स्कूल वालो ने वैष्णो देवी के लिए ट्रिप ऑर्गनाइज करवाया। इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती थी? पर घर वालों को कौन मनाए ? सब एक दूसरे के पापा मम्मी को मनाने लगे। दीपिका की तो यह पहली ट्रेन यात्रा थी। मुझसे इसका ज़्यादा excited होना बनता भी था। जनवरी में जम्मू बहुत ही ज़्यादा खूबसूरत लगता है और जब दोस्त साथ हो तो फिर और क्या चाहिए ?

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वक़्त बहुत जल्दी बीत गया। सब वैसा ही रहा। स्कूल खत्म होने के दिन आ गए बस।
यादें आज भी ताज़ी है वो 7 घंटे की शॉपिंग की जिस में हमने बस एक ड्रेस लिए था। Farewell था हमारा। वो आखिरी दिन कोई खुश नहीं था। सबकी आंखो में आंसू थे। दुबारा मिलने के वादा था। दोस्ती चलती रहे इसकी कसम थी। पर शायद स्कूल के गेट से निकलते ही सब इतने व्यस्त हो गए की पूराना सब भूल गए हो।

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18 June 2013

मेरा दिल्ली से सफर खत्म हुआ। यकीन नहीं हो रहा था पर सच्चाई भी यही थी। दिल्ली छोड़ अब दरभंगा में रहना था। पता ही नहीं चल रहा था दुःख किस बात का हो रहा था। दिल्ली छोड़ने का, दोस्तो से कभी नहीं मिलने का या फिर दरभंगा में अब हमेशा रहने का। दरभंगा मुझे बचपन से ही नहीं पसंद था इसलिए यहां आ कर भी कभी अपनापन सा नहीं लगा मुझे और शायद कभी लगे भी ना। फिर नई जगह और इस बार तो नया शहर भी। दीपिका से भी बातें कम होने लगी। धीरे धीरे खत्म ही हो गई।

एक दिन 8 जुलाई 2017 को Facebook par message आया। भाई मेसेज deepika का था। यकीन नहीं हो रहा था कि उसने मेसेज किया मुझे।
क्यों????

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कैसे यकीन करती ? मैं जिस दीपिका को जानती थी वो तो फोन यूज करना ही नहीं जानती थी। उसका facebook id मैंने ही बनाया था जिसको उसने कभी खोला भी नहीं था। पर लड़की की याददाश की तारीफ करनी चाहिए। 5 साल पहले का पासवर्ड उसे याद था।
उसके एक मेसेज ने हमारी खोई हुई दोस्ती को जगमगा दिया फिर से। अंधेरे की जीवन में रोशनी की एक दिया साबित हुई दीपिका। बातें वो ही से शुरू हुई जहां पर छोड़ी थी। लगा ही नहीं की सालों बाद बात हो रही। अर्सो बरसों की बातें बतानी थी। दस दिन तक शायद हम दिन रात बात करते रहे। अपने अपने जीवन का हर एक पन्ना जो खोलना था। इतने सालों में क्या क्या हो गया। इस बार जब दुबारा हाथ थामा तो इस ही वादे के साथ की कभी कुछ भी हो जाए अलग नहीं होना। कुछ खोया हुआ वापिस मिल गया था मुझे तो। हर रोज़ दीपिका का एक ही सवाल होता था कि दिल्ली कब आएगी तू यार और मैं हर बार एक ही जवाब देती थी जब किस्मत ले आए।

लोगों को आते है
दो नजर
हम मगर
देखो दो नहीं ।

24 JANUARY 2018

पांच साल से दिन रात बस एक ही सपना देखा था कि दिल्ली कब जाऊंगी। और वो दिन आ ही गया। कभी कभी कुछ चीजें सच भी हो जाए तो यकीन नहीं होता । ट्रेन में बैठने के बाद भी किस्मत पर पता नहीं यकीन करना मुश्किल हो रहा था। ट्रेन में बैठने से पहले मैंने किसी को नहीं बताया था कि मैं दिल्ली आ रही। और जब दीपिका को पता चला तो उसे भी यही लगा कि मज़ाक है यह। पर इस दफा सच था।
25 तारीक को 11:40 की सुबह जब आंखो के सामने नई दिल्ली का बोर्ड देखा तब यकीन किया खुद भी। 4 फरवरी को मिली मैं दीपिका से पांच साल बाद। हर एक मिनट उसने मुझे इतना स्पेशल feel कराया जो शायद शब्दों में बयां करना मुश्किल है मेरे लिए। दुनिया बदल जाए पर ये मैडम नहीं बदली थी। अब भी बस में अकेले नहीं चढ़ती थी। अब भी कहीं घूमने के प्लान में इसको घर से पिक उप करना होता था। मेट्रो में अकेले आने कि कभी उसने हिम्मत ही नहीं की थी । और इस बार दिल्ली में दीपिका से दुबारा मिल कर एहसास हो गया कि यह वो है जो मेरे अनकहे दर्द भी समझ लेती है। मेरे हर सुख दुःख में बिना बोले कुछ खड़ी रहना बेहतर समझती है। चाहे गुस्से में कितना भी कुछ बोल दिया हो मैंने इसने कभी दिल से नहीं लगाया।

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अच्छाइयों की पूरी भंडार है यह। लेकिन अब बदल गई है। अब मेट्रो में अकेले चल लेती है। अकेले आना जाना शुरू कर दिया इसने 6 महीने में। Facebook के इलावा Instagram भी चलाना सीख गई है। लोगों को अब खुद ही ढूंढ़ लेती है। (I hope you understand this)

भले ही मेरे birthday का वो स्पेशल गिफ्ट इसने आज तक मुझे नहीं भेजा हो पर Still I love you the most… ❤❤❤❤❤❤❤

” सात अजूबे इस दुनिया में
आठवीं अपनी जोड़ी
अरे तोड़े से भई टूटे ना
ये टेडी निधि की जोड़ी। “

P.S : For the world she is Deepika, for us She is Tedi..😍 #टेडीहैपरमेरीहै ।

Happy Birthday Deepika..😍 #meridelhiwaligirlfriend

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OUT OF LOVE

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BLURB :

Some relationships in life begin casually and come with us for a very longtime, more than we expected! Sometimes we misunderstand people and a few times we misunderstand what they mean to us. When we realize it, it is too late. Do we get a chance to restart? This fiction is about a few people in their prime part of life – late teens to early twenties. PRIYA, the talkative, boisterous girl sets the pace of the story. She can be friends with anyone unlike SANJANA, who sees her bestie and only friend in Priya. All Indian teenage girls have a thing in common – their liking for reel life heroes. The girls were no exception. They are die-hard fans of an upcoming actor from a star family, RISHI. Not an everyday thing, but it did happen to them. Priya, Sanjana and Rishi cross paths. They meet, greet, get friendly and get closer. It is about these three people’s journey – their emotions, their behaviors, and their relationship. The same love that brings them closer drifts them apart when dynamics change. Out of Love, do they make, break or mend their relationship!

MY REVIEW : 

Out of Love by Swetha R Mohan is a beautiful book expressing the theme of friendship and love. The blurb of the book is quite engaging and one cannot stop without turning the pages. The cover of the book is simple yet beautiful. The book starts with Priya and Sanjana and few friends going out for a movie. Later, they meet the same film star Rishi in the theatre. Priya and Rishi kept on bumping after that but Sanjana beauty just created some magic on Rishi at first sight. Priya also noticed this in the coffee shop. The friendship between Priya and Rishi was growing whereas love hit both Sanjana and Rishi and they came into relationship. This book will let you realize the value of friendship and how it feels when love hits you unexpectedly. This book will bring the roller coaster of emotions within you. Overall, I enjoyed reading this book a lot. The narration of the book is simple and one won’t regret reading this book at all.

RATING: 5/5 

ORDER THE BOOK FROM:  https://www.amazon.in/Out-Love-Swetha-R-Mohan/dp/8193463382/ref=sr_1_1?ie=UTF8&qid=1544066099&sr=8-1&keywords=out+of+love+by+swetha

SATRANGI SYAAHI

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The book is provided by <a href=”https://www.facebook.com/arudhaclub ”> Arudha Club</a> in exchange for a genuine review.

BLURB :

As the rainbow deck up the sky with its beautiful mesmerizing colours, in the same way a human heart is an enchanting canvas of colourful emotions. The stark red paints love and passion, blue the gloom, the bubbly pink immerses you in the carefree memories of childhood and white depicts the gravity of mood. Satrangi Syaahi is one such collection of beautiful Hindi poetry that captures vivid emotions of human heart and takes you on a beautiful journey, Life. This collection of poetry is a reflection of emotions of two authors Surendra Kumar Gupta and his daughter, Neha Jindal (author of Phases of Moon). Experience the colours of life through this emotional web of words.

MY REVIEW :

Satrangi Syaahi is a co-authored book by Surendra Kumar Gupta and Neha Jindal. The title ‘ Satrangi Syaahi’ is an apt title for the book and the cover of the book is designed beautifully. In the blurb, the authors have beautifully compared rainbow and feelings of human heart.

The book is divided into five sections and is a collection of total fifty three poems. In the first section , ” व्यंग्य ” , the poets have shown the dual faced society in a funny way. There is a line from the poem ” Sharafat Ke Poojati” that I liked.
” दुनिया इतनी कपटी हो गई है,
यह देखकर दंग रह गए।”

One of the section, ‘ Desh Prem’ has beautiful poems to be read. I personally loved Bhav Bheeni section the most and I read every poem of that section twice. There is a line from a poem that I thought to note down.
” कल तक हमने लड़ी लड़ाई
आज वास्तव हार गए। “
The poem ‘Maa’ is my favourite poem in the whole book. It has an emotional touch.
Overall, I completely enjoyed reading all the poems. The language is quite easy to understand and one can connect to many poems in the book and this is the best part of reading any book.

RATING : 4/5

ORDER THE BOOK FROM : https://www.amazon.in/Satrangi-Syaahi-Surendra-Kumar-Gupta/dp/164429575X/ref=mp_s_a_1_1?ie=UTF8&qid=1542281138&sr=8-1&pi=AC_SX118_SY170_FMwebp_QL65&keywords=satrangi+syaahi

अभय की डायरी से….

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दिनांक : 4/10/2018

तुम याद तो बहुत आती हो, कभी कभी तो इतना की भरी महफ़िल में भी आँसू छुपाना मुश्किल हो जाता है। कितने हसीन थे वो दिन जब हम साथ हुआ करते थे। लोग अभय-श्रुति के प्यार का उदाहरण दिया करते थे पर तुम चली गई मुझे छोड़ कर या यूँ कहूँ मैंने खो दिया तुम्हें । कितने खूबसूरत थे वो दिन जब हम साथ बैठकर घंटों यूं ही फिजूल बातें करते पर तब भी मन नहीं भरता था। दिल करता था वक़्त थम जाए और हम यही के हो कर रह जाएं। लेकिन सच्चाई को आज तक कौन झुठला पाया था। सच तो यह है कि तुम चली गई , मुझे छोड़ कर अकेला।

हां बेवफा तो मैं ही था जिसने तुझे धोखा दिया था। तुम पर शक करना किसी धोखे से कम था क्या ? तुम कितना समझाती रही , रोती बिलखती हमेशा यकीन दिलाने की कोशिश में रहती थी कि तुम्हारे लिए वो बचपन के दोस्त बहुत मायने रखते है , लेकिन मैं समझा नहीं । हर लड़के के साथ तुम्हारा रिश्ता जोड़ दिया और इस खातिर तुमने अपने दोस्तों को खो दिया । मेरे लिए तुमने आधों से रिश्ता तोड़ दिया। लेकिन भूल गया था मैं की तुम भी तो इंसान हो। एक दिन तुम्हारे सब्र का बांध टूट गया और तुमने एक झटके में रिश्ता तोड़ दिया। उस दिन शायद तुम पूरे मन से आई थी मुझसे आजाद होने के लिए। तुम्हारे पास मेरे क्यूं का जवाब तो नहीं था पर तुम्हे अब अलग होना था। कितनी ज़बरदस्ती करता ? तुम्हारा हाथ पकड़ने कोशिश की तो तुमने एक झटके में हाथ छुड़ा लिया था और चिल्ला उठी बीच सड़क पर – “एक बार में समझ नहीं आता, मुझे नहीं रहना तुम्हारे साथ। आज के बाद मिलने का या बात करने का कोशिश भी मत करना।”
ये बोलते हुए तुम्हारा पूरा शरीर कांप रहा था। आंखो से आंसू बह रहे थे । पर तब भी तुम अलग होना ही मंजूर था। उस दिन तुम्हें लोगों की भी परवाह नहीं थी। कितने लोग उस मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों से उतर चढ़ रहे थे। सब हमें ही देख रहे थे। कुछ तो रुक ही गए थे तमाशा देखने। जो लड़की आज तक बाहर लड़ी नहीं किसी से वो आज इतना चिल्ला रही थी कि आसपास खड़े लोगो को भी नहीं छोड़ा। सब चलते बने और तुम भी तेज़ रफ्तार में चली गई सामने वाली मेट्रो पकड़ने। और मैं वहीं खड़ा तुम्हें एकटक निहारता रहा। उसके बाद से तुम्हें एक बार ही फोन भी किया था पर तुमने काट दिया और एक ही हफ्ते में नंबर भी बदल लिया। अब हमारे बीच कुछ नहीं बचा था। मिलने की भी कोई उम्मीद नहीं थी। अपनी हरकतों पे पछतावा तो बहुत हो रहा था लेकिन तुम्हारी इस आदत से बहुत खूब से वाकिफ था कि तुम रिश्ता तोड़ने में भरोसा नहीं रखती । देखा था कैसे तुम हर रिश्ता को बचाने के कोशिश में लगी रहती थी पर जब एक बार तोड़ देती थी तो दुबारा कभी मुड़कर नहीं देखती फिर चाहे वो इंसान कितना भी शर्मिंदा क्यूं ना हो अपनी किए पर।

खैर तुम चली गई ! मान लिया इस बात को । एक ही शहर में रहते हुए तुम कभी दिखी तक नहीं । तुमने घर भी बदल लिया था अपना और दिल्ली शहर इतना छोटा कहां की कोई खोए हुए को ढूंढ पाए । मैंने भी कोशिश छोड़ दी। लेकिन एक बात कहूं तुम्हारे जाने के बाद एहसास हुआ की हमारे रिश्ते को गलतफहमी ने निगल लिया। तुम काम में बहुत व्यस्त रहती थी पर मुझे लगता था कि वो बहाना था तुम्हारा । तुम्हारा काम से फुर्सत मिलते ही फोन व्यस्त बताता तो मेरा गुस्सा हावी हो जाता था और क्या कुछ नहीं बोल जाता था तुम्हें। तुम भी कहां चुप रहती थी। सुप्रीम कोर्ट की वकील जैसे हर एक तर्क का जवाब देती। हारती नहीं थी बहस करने से। फिर चाहे वो बहस हफ्ते तक ही क्यूं ना चलती रहे। तुम्हारी आदत थी गलत को आइना दिखाने का।

रिश्ता हम दोनों की वजह से ख़तम हुआ। तुम्हारे एक अजीज़ दोस्त से पता चला कि तुम हमारे अलग होने का कारण किस्मत पर मढ़ देती हो। ना खुद को गलत बताती और ना मुझे गलत कहती । हमारे रिश्ते में प्यार तो बहुत था लेकिन फिर भी अलग हो गए। तुम्हारे जाने के बाद से मैं बहुत बदल गया। शराब से भी दोस्ती कर ली थी। लेकिन फिर तुम्हारी कही बात याद आई कि इंसान जीते ही है लोग के मरने के बाद । खुद को बर्बाद कर के तुम सज़ा अपने मां बाप को दोगे । वो तुम्हें ऐसे देख कर खुद में कमी खोजेंगे । ये सब सोच कर शराब को भी ठुकरा दिया। फिर दुबारा हाथ नहीं लगाया। तुमसे दूर था लेकिन तुम्हारी खबर हमेशा रखता था। पता चला तुम मूव ऑन कर गई हो हमारे रिश्ते से। तुम्हें अब किसी बात का ग़म नहीं और मुझसे प्यार भी नहीं करती अब। ये सुन कर तकलीफ हुई। अलग होना कष्टकारी था लेकिन ये सुन कर मानो टूट ही गया । तुम्हारे दिल से प्यार ख़तम हो गया । लेकिन अब पूछता कैसे ?
तुम्हारे जाने के बाद कितनी रात मैंने भी रो कर गुजारी थी। सब से रिश्ता तोड़ दिया था। बस तुम्हे याद करता। कनॉट प्लेस की गलियों मानो चीख रही हो । वो चाय की टपरी
याद हैं ? वो रामू आज भी देख कर मुस्कुरा देता है और पूछता है दीदी नहीं आई ? मैं भी क्या बोलूं हर बार कह देता हूं वो शहर के बाहर गई है। लेकिन वो भी अब समझ गया था कि अब दीदी कभी नहीं आएगी। अब बस मुस्कुरा कर चाय थमा देता और तुम्हारे बारे में पूछता तक नहीं। वो तिलक नगर मेट्रो स्टेशन के नीचे छोले कुलचे वाले के पास मैं आज भी जाता हूं पर अब ज़्यादा मिर्ची वाले छोले खाने लगा हूं। तुम्हे पसंद थी मिर्च इसलिए अब मैं भी खाने लगा हूं। भैया कहता भी है कि बेटा फीका बना दूं। तुम्हारी आंखो से पानी आ रहा। पर उन्हें क्या पता कि यह मिर्ची की वजह से नहीं, तुम्हारी याद में आ रहे।

दिल करता की एक बार जीवन में तुम मिल जाओ तो अपना दिल खोल कर रख दूं तुम्हारे आगे। भगवान भी इतने निष्नठुर हीं। मेरी आखिर सुन ही ली। पांच साल बाद तुम एक दिन मिल गई। तुम थम सी गई मुझे देख कर। पर मुझे ना जाने क्या हो गया। मैं चिल्ला उठा तुम पर। पिछली बार तुम्हे लोगों का फ़िक्र नहीं थी, इस बार मुझे नहीं रही। तुम मुझे देख कर सहम गई थी। लेकिन मुझे जानना ही था कि तुमने मुझे क्यूं छोड़ दिया था। इस बार कुछ अलग था लेकिन तुम चिल्लाई नहीं एक बार भी, थोड़ा सा भी गुस्सा नहीं दिख रहा था तुम्हारी आंखो में और ना ही मुझे ग़म दिखा ।
” मुझे तुझसे अब डर लगने लगा था। तुम कभी भी हंगामा करने की जो धमकी देने लगते थे ना इससे मुझे घुटन होने लगी था। आज हम पांच साल बाद मिले, लेकिन तुम फिर चिल्ला उठे। बस यही वजह थी कि तुम्हे छोड़ना बेहतर समझा। शादी के बाद तलाक से तो बेहतर ही था कि अब ही अलग हो गए। “ एक सांस में तुमने सब बोल डाला।
“मैं बदल भी तो सकता था, तुम मुझे सुधार भी तो सकती थी। “
” बहुत कोशिश की थी मैंने। मुझे भी उतनी ही तकलीफ हुई थी, पर जिस दिन एहसास हुआ कि प्यार से ज़्यादा हावी डर का हो गया हमारे रिश्ते में, मैंने तोड़ना ही बेहतर समझा। ” तुम बोली और इस बार तुम्हारी आंखो में भी आंसू था
लेकिन तुमने बहने नहीं दिया अपने आंसुओ को और बोली , “चलती हूं बहुत देर हो रही। खुश रहो हमेशा। और हां मैंने मूव ऑन कर लिया है, बेहतर है तुम भी कर लो।”

मैं एकटक तुम्हें निहारता रहा था और तुम सामने वाली मेट्रो में चढ़ कर निकल गई।

पिछली बार जब तुम गई थी तो बहुत कुछ उलझा रहा , इस बार गई तो ऐसा लगा सब सुलझा गई लेकिन मैंने एक बदली हुई श्रुति को इस बार देखा। हमेशा चंचल सी उड़ती लड़की एकदम शांत हो गई। गलत सुनना भी जो पसंद नहीं करती थी आज गलत बातों को सहने लग गई। हर किसी से दौड़ में आगे निकलने के बजाय अब वो भीड़ के साथ चलना पसंद करने लगी थी। बड़े बड़े ख्वाबों को देखने वाली मेरी श्रुति अब हर हालत को स्वीकारने के लिए तैयार थी।
बहुत बदल गई थी तुम। सच ही कहते थे लोग की प्यार इंसान को बदल देता है।

पांच साल हो गए अलग हुए पर लगता है जैसे कल ही सब बात थी। गलती भी किसी की नहीं थी , प्यार भी बहुत था पर किस्मत में नहीं था हमारा साथ और बिछड़ गए हम दोनों हमेशा के लिए, प्यार को कहीं बहुत अंदर दफना कर चल दिए अपने अपने रास्ते।

TABLE FOR ONE

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BLURB :
Taara Maheshwari, a single woman in her thirties and a successful lawyer, is tough from outside but a die heart fan of romantic movies from inside.
She grew up seeking her “happily ever after’ but amid various heartbreaks and culture of modern age short term relationships, her believe in “true connections” got replaced by the comfort of being “emotionally disconnected.”
After she turned 31, her parents persuaded her into meeting a guy for marriage who sounded just perfect for her. Acting on impulse, she told her parents that she would meet him only if they let her go on a trip to Europe.
As Taara went on to explore the world, she experienced what actually happens when a single Indian girl travels to Europe all by herself. Is it only about dancing, singing or falling in love? What happens after you fall in love? Does love conquer all?
Only her story would tell.

MY REVIEW :

‘Table For One’ By Neha Bindal is a book that will remind you of days of the adventures you did in life and will make you regret if you never did any. The title of the book is apt and the cover is designed amazingly. I feel no other cover would have done justice to the novel. The blurb will excite you to turn the pages as soon as possible.
The book holds the story of Taara Maheshwari, the main protagonist of the novel. Taara is all set for her solo trip to Europe. Her parents sent her on the promise that once she is back she will get married. The story takes an exciting turn after this. She was experiencing new things and most importantly she was discovering herself. The book will run various emotions within you. The narrative technique of the author is brilliant. The description of the places done by the author will make you feel like you are travelling with Taara. Overall, the book proved to be an enjoyable read for me.

RATING : 5/5

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2 DAY DOWN

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BLURB :
2-day-down is a compilation of stories of 5 women from different walks of life. Each story digs into one of the five period related problems: Pain/Staining/Sexual Inhibition/PMS/Taboo, through each one’s journey. The title signifies the second day of a woman’s period, which is said to be the toughest of the five days. The stories are a reflection of the less acknowledged society around us. Through menstrual problems as a window, the book is an attempt to bring light to the intriguing yet briefly understood aspects of womanhood in different age groups.

ABOUT THE AUTHOR :
Dr. Nikita Lalwani considers herself to be married to writing, and is very happy in this relationship. She authored her first book Live Life… Stop Analysing it, at the age of 16. Her last book 2 peg kebaad won great appreciation by its readers and critiques. Swimming, spirituality, reading, and movies are other important aspects of her life. Nikita moved to writing blogs soon after completing her college, and currently works as an advertising professional in a reputed ad agency in Mumbai.

MY REVIEW :

‘2 Day Down’ By Dr. Nikita Lalwani is a great attempt taken by the author to show case the conditions of the women. The title is perfect for the book and the sub title is thoughtful. The cover looks a bit complicated but is designed beautifully. The blurb of the book will make many things clear in your mind. The best part what I felt is that the author chose to write on those topics on which the world hesitate to talk about. All the five stories convey a powerful message to the society. The five more serious issues are talked about in the form of stories. I cannot call any one as my favourite as each story has its own value. The writing style of the author is amazing and the narrative technique is brilliant. The language of the book is lucid. Overall, it is a great read.

RATING : 5/5

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दिल की छोटी-छोटी ख़्वाहिशें

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कभी कभी दिल चाहता हैं भाग जाऊं! हाँ, भाग जाऊं सब चीज़ों से ,मन की शांति के लिए। संभाले नहीं संभल रही कुछ चीज़ें और पूरी नहीं कर पा रही हूँ अपनो की अपेक्षाएं। वो सोलह साल की लड़की जिसने न जाने कितने ख़्वाब बुने थे, ख़ुद को कहाँ पहुँचाने का सोचा था और आज जीवन उस मोड़ पर आ गया की बस यूँ ही दिन काट रही, बिन मंज़िल के चली जा रही हूँ , सफ़र खत्म ही नहीं हो रहा और न कोई नया रास्ता मिल रहा है । समझ नहीं आ रहा कि खुद को समझाया जाए या लोगों को कि उम्मीद कम रखें। दिल तो अब भी एक बच्चे की तरह खिलखिला उठता है हर छोटी खुशी में पर जब रोने की बारी आती है तो दुनिया से छुपने को एक कोना ढूंढता है। तब एहसास होता है कि कितने बड़े हो गए कि गम छुपाना पड़ रहा है और छुपा क्यूं रहें है इससे खुद भी अक्सर बेखबर ही रहते। कई बार तो यह हाल होता है कि ग़म किस बात का है इसका भी पता नहीं होता। बस ना कुछ अच्छा लगता है, ना किसी से बात करने का मन करता है। अकेलापन भाता है दिल को, सुकून का एहसास उस में ही होता है।

बहुत ज़्यादा दिखावा कर के जीना पड़ता है अब तो। पहले जिन अदाओं पर हमारे हंस दिया करते थे , मासूमियत झलकती थी , आज उन्हीं हरकतों पर लोग बातें सुनाने लगे है। “उम्र का लिहाज ही नहीं,कितनी बचकानी हरकत है” जैसी बातें सुनने को मिलती हैं, और तब लगता है कि अब तो जीना भी अपने हिसाब से मुमकिन ना रहा। जब बच्चे थे तो बड़े होने की बहुत दिली तमन्ना थी। सच कहूं तो अब वो बचपन के दिन ही ठीक लगते थे। काश वक़्त लौट पाता और हम वो दिन फिर से जी पाते!

बचपन में कोई पसंद होता था तो कितना आसान होता था यह कहना की आप बहुत अच्छे हैं, आप मेरे फेवरेट हैं। अब वक़्त के साथ यह सब कहना भी मुश्किल हो गया है। जिसको कहना है वो कहीं कुछ गलत ना सोच ले यह सोच कर अपने सर में दर्द करवा लेते है और कह भी नहीं पाते। बचपन में किसी को रोता देख कर तुरंत पहुंच जाया करते थे उसको चुप कराने। दिल अब भी उतना ही बेताब होता है जब किसी को रोता देखते है पर अब जा कर चुप नहीं करा पाते।असहाय सा खड़ा हो कर एक टक बस निहारते हैं। हर दिल में एक तकलीफ है जिसका आभास सामने वाले को होता है पर अब पूछने से डर लगता है। इसलिए तमाशा देखते रहते हैं।

सुनो ना ! अभी भी कभी-कभी ट्रेन से जाते वक़्त रोड पर खड़े लोगों को बाय-बाय करने का जी चाहता है लेकिन हाथ बढ़ा कर भी पीछे कर लेते है। अपनी खुशी से बढ़ कर चिंता होती है साथ की सीटों पर बैठे लोगों कि कि वो क्या सोचेंगे ? पता नहीं आपको करता है कि नहीं पर मुझे तो अभी भी जब वो हवाई जहाज मेरे घर के ऊपर गुज़रता है तो दौड़ कर बाहर जाने का मन करता है लेकिन कदम पीछे करने पड़ते है। अभी भी आइसक्रीम और गुब्बारे उतने ही आकर्षित करते है जितने तब किया करते थे जब पापा खुशी-खुशी वो सब ला दिया करते थे। पर अब न मांग पाते हैं और खुद खरीदने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। कौन सुने वो तानों की बौछार ?

बचपन में कोई पूछता था कि क्या बनना है तो बिना सोचे फटाफट बोल देते थे कभी कि डॉक्टर बनना है, कभी टीचर , कभी पायलट , कभी कुछ ओ कभीकुछ ! बड़े बड़े ख्वाब बचपन से ही देखे थे। आज वो ही सवाल जब कोई पूछता है तो जवाब ही नहीं होता। होता भी है तो हिकिचाते हैं। चुप रहना बेहतर समझते है। कहीं न बन पाए तो ? लोग मज़ाक उड़ाएंगे !

कोई सच में अगर जानना चाहता है कि मुझे क्या करना है तो सुने मुझे ना अपने चौबीस घंटे में कुछ आठ घंटे वो अनाथ आश्रम के बच्चो के साथ बिताना है और बाकी कुछ छह घंटे वृद्धाश्रम के लोगों के साथ। उनके लिए ही कुछ करना चाहती थी हमेशा से। करना तो आज भी चाहती हूं लेकिन अब दिल में रखना पड़ता है इस ख़्वाब को क्योंकि खुद ही उस लायक नहीं बन पाई , पता नहीं आगे भी बन पाऊं या नहीं।

कभी कभी लगता है उम्र से ज़्यादा बड़े हो गए हैं। बहुत कुछ ज़िन्दगी ने अभी ही सीखा दिया। बहुत कुछ सुनाना चाहते है लेकिन आज के भाग दौड़ में किसको इतनी फुर्सत कि बैठ कर सुने । अपने ही उलझनों को सुलझाने में सारा वक़्त ज़ाया हो रहा।

खैर! यह सब आज लिखा क्योंकि आज एहसास हो रहा था ताजी हवा में बैठ कर भी दम घुट रहा है। खुले आसमान के नीचे भी कितना अंधेरा है। सब अपनों के बीच बैठ कर भी कितना अकेलापन है। ज़िंदा तो सब हैं पर जी कोई भी नहीं रहा। दिखावे की दुनिया में असलियत ने दम तोड़ दिया है। और सब ही एक झूठी मुस्कान के साथ ज़िंदगी बिता रहे हैं ।

– निधि💕